Prince Khan Gang: यूएई नंबर से रंगदारी की धमकी, झारखंड पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना गैंगस्टर प्रिंस खान

 धनबाद से रांची तक कारोबारियों को धमकी देने वाला गैंगस्टर प्रिंस खान झारखंड पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। यूएई के वर्चुअल नंबर और डार्क वेब का इस्तेमाल कर पुलिस को चकमा दे रहा है।


Prince Khan Gang रांची: झारखंड में रंगदारी और आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच गैंगस्टर प्रिंस खान राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। धनबाद से लेकर राजधानी रांची तक कारोबारी, बिल्डर, ज्वेलर्स और डॉक्टर लगातार उसके निशाने पर हैं। रंगदारी की मांग और धमकी भरे संदेशों के मामलों में उसका नाम सामने आने के बाद झारखंड पुलिस, एटीएस और खुफिया एजेंसियां उसकी तलाश में जुटी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस सफलता हाथ नहीं लगी है।

सूत्रों के अनुसार धनबाद, रांची, रामगढ़, हजारीबाग, बोकारो और जमशेदपुर सहित छह बड़े जिलों की पुलिस टीमें प्रिंस खान की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। इसके बावजूद वह लगातार पुलिस की पकड़ से बाहर बना हुआ है।

Prince Khan Gang: यूएई नंबर से भेजी जा रही धमकियां

जांच एजेंसियों के मुताबिक इन दिनों रंगदारी की धमकियों में जो नंबर इस्तेमाल हो रहा है, वह संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के इंटरनेशनल कोड +971 से जुड़ा हुआ है। धमकी भरे संदेश व्हाट्सएप वॉइस नोट और टेक्स्ट मैसेज के माध्यम से भेजे जा रहे हैं।

पुलिस के पास नंबर की जानकारी होने के बावजूद आरोपी तक पहुंचना आसान नहीं है, क्योंकि यह नंबर पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क की बजाय इंटरनेट आधारित तकनीक पर संचालित हो रहे हैं। इसी वजह से सामान्य सर्विलांस तकनीकें प्रभावी साबित नहीं हो पा रही हैं।


Key Highlights

  • प्रिंस खान की तलाश में झारखंड के छह जिलों की पुलिस और एटीएस जुटी।

  • यूएई के वर्चुअल नंबर से कारोबारियों को मिल रही रंगदारी की धमकी।

  • डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड ऐप्स के कारण पुलिस की निगरानी व्यवस्था बेअसर।

  • बिना पहचान पत्र के खरीदे जा रहे वर्चुअल नंबर जांच में बड़ी बाधा।

  • तकनीकी एजेंसियां अब अंतरराष्ट्रीय गेटवे और ऐप नोड्स की निगरानी में जुटीं।


Prince Khan Gang: डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड ऐप्स बने सुरक्षा कवच

तकनीकी एजेंसियां अब उन अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म और डार्क वेब नेटवर्क की निगरानी कर रही हैं, जहां से वर्चुअल नंबर खरीदे और संचालित किए जा रहे हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन ऐप्स का इस्तेमाल कर रहा है।

इन ऐप्स के जरिए होने वाली बातचीत को ट्रैक करना बेहद कठिन होता है। विशेषज्ञ अब इन प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली को समझने और तकनीकी स्तर पर विश्लेषण करने में जुटे हैं, ताकि अपराधियों के डिजिटल नेटवर्क तक पहुंच बनाई जा सके।

Prince Khan Gang: तीन बड़ी वजहों से पुलिस का सर्विलांस हो रहा फेल

जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार प्रिंस खान और उसका नेटवर्क वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल (वीओआईपी) तथा वर्चुअल नंबर तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये नंबर किसी मोबाइल टावर से नहीं जुड़े होते, बल्कि इंटरनेट आधारित सिस्टम पर संचालित होते हैं।

ऐसे में जब पुलिस पारंपरिक टावर डंप या लोकेशन ट्रैकिंग तकनीक का उपयोग करती है तो उसे कोई उपयोगी डेटा नहीं मिल पाता। यही कारण है कि आरोपी की वास्तविक लोकेशन का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

Prince Khan Gang: बिना पहचान पत्र के मिल रहे वर्चुअल नंबर

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार डार्क वेब पर कई ऐसे प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं जो बिना किसी पहचान पत्र या सत्यापन प्रक्रिया के वर्चुअल नंबर उपलब्ध कराते हैं। इन सेवाओं का भुगतान आमतौर पर क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से किया जाता है।

क्रिप्टोकरेंसी आधारित भुगतान और गुमनाम पंजीकरण के कारण उपयोगकर्ता की वास्तविक पहचान छिपी रहती है, जिससे जांच एजेंसियों को अपराधियों तक पहुंचने में काफी कठिनाई होती है।

Prince Khan Gang: विदेशी डेटा हासिल करने में लग जाता है लंबा समय

जांच एजेंसियों के सामने एक और बड़ी चुनौती विदेशी नंबरों से जुड़ा डेटा हासिल करना है। किसी अन्य देश के टेलीकॉम ऑपरेटर या सेवा प्रदाता से जानकारी प्राप्त करने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसमें कई बार महीनों लग जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसी समय का फायदा उठाकर अपराधी अपनी डिजिटल पहचान, नंबर और संचार माध्यम बदल लेते हैं, जिससे जांच की दिशा प्रभावित होती है।

झारखंड पुलिस और तकनीकी एजेंसियां फिलहाल प्रिंस खान के डिजिटल नेटवर्क को तोड़ने और उसके संपर्क सूत्रों तक पहुंचने के लिए आधुनिक साइबर तकनीकों का सहारा ले रही हैं। हालांकि यह मामला राज्य में संगठित अपराध और साइबर तकनीक के बढ़ते गठजोड़ की गंभीर तस्वीर भी सामने ला रहा है।

 

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