BJP के लिए प्रतिष्ठा का विषय बना है बांकीपुर सीट, पार्टी एक बार फिर कायस्थ पर जताएगी भरोसा या सवर्ण चेहरे को मिलेगा मौका, चर्चा में हरेंद्र सिंह…

पटना : राजधानी पटना के बांकीपुर के विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रहे नितिन नवीन को पार्टी आलाकमान ने राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका दे दी। उनके विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद अब इस सीट पर उपचुनाव की सरगर्मी बढ़ने लगी है। एक तरफ यह सीट राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट और लंबे समय से कब्जा की वजह से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए इज्जत की सीट बनी हुई है तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां इस पर कब्जा करने का जुगत लगा रही हैं।

बंगाल और असम जैसी राज्यों में सरकार बनाने के बाद पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं का हौसला बुलंद है

हालांकि पश्चिम बंगाल और असम जैसी राज्यों में सरकार बनाने के बाद पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं का हौसला बुलंद है। बावजूद इसके भाजपा नेतृत्व अपनी इस सीट को बचाने के लिए अभी से जोड़ घटाव करने में जुट गया है। चूंकि यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बिहार सरकार के पूर्व मंत्री नितिन नवीन की राजनीतिक कर्मभूमि रही है। इसलिए यहां उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह गहन मंथन स्वाभाविक है।

प्रतिष्ठा की सीट पर बढ़ी दावेदारों की संख्या

बांकीपुर सीट को लेकर भाजपा के भीतर कई नामों की चर्चा चल रही है। राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि इस सीट पर टिकट का फैसला केवल व्यक्ति विशेष के आधार पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता, जन-स्वीकार्यता, सामाजिक समीकरण और भविष्य की राजनीतिक रणनीति को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

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कायस्थ समाज की दावेदारी भी बनी चर्चा का विषय

बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। यह क्षेत्र लंबे समय से कायस्थ मतदाताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। इसी कारण चुनावी चर्चा के साथ-साथ कायस्थ समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा भी इस सीट पर अपने समुदाय के प्रतिनिधित्व की मांग उठाई जा रही है। बीजेपी नेताओं की भी मानें तो राजधानी पटना की एक भी सीट में वर्तमान समय में कोई सवर्ण विधायक नहीं है। सवर्ण वोटर बीजेपी के परंपरागत वोटर रहे हैं, ऐसे में क्या राजधानी सवर्णों से खाली करने का काम तो बीजेपी नहीं हो करेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के सामने उम्मीदवार चयन में यह एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है। पार्टी को संगठनात्मक निष्ठा और चुनावी गणित के साथ-साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर भी संतुलन बनाना होगा।

संजय मयूख का नाम चर्चा में था, लेकिन बदले समीकरण

कुछ समय पहले तक भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता संजय मयूख को बांकीपुर सीट का एक मजबूत संभावित दावेदार माना जा रहा था। हालांकि उन्हें विधान परिषद भेजे जाने के बाद राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि अब उनके विधानसभा चुनाव लड़ने की संभावनाएं खत्म हो गई हैं। इसके बाद अन्य संभावित नामों की चर्चा और तेज हो गई है।

प्रोफेसर रणवीर नंदन व ऋतुराज सिन्हा भी संभावित चेहरों में शामिल

बांकीपुर सीट को लेकर जिन अन्य प्रमुख नामों की चर्चा है, उनमें प्रोफेसर रणवीर नंदन का नाम भी शामिल है। वर्तमान में बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रणवीर नंदन की शैक्षणिक और सामाजिक पहचान उन्हें एक गंभीर दावेदार के रूप में स्थापित करती है। वहीं दूसरी ओर ऋतुराज सिन्हा का नाम भी लगातार राजनीतिक चर्चाओं में बना हुआ है। राष्ट्रीय स्तर की राजनीति और संगठन में सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें भाजपा के युवा और आधुनिक नेतृत्व के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी भविष्य के नेतृत्व को प्राथमिकता देती है तो उनका नाम भी निर्णायक रूप से उभर सकता है।

कायस्थ समाज से बाहर हरेंद्र सिंह समेत कई अन्य नाम भी चर्चा में

इन्हीं चर्चाओं के बीच अंदरखाने से भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व पटना महानगर अध्यक्ष हरेंद्र सिंह के साथ अन्य कई लोगों का नाम भी प्रमुखता से सामने आ रहा है। हरेंद्र सिंह राजपूत (सवर्ण) समाज से आते हैं। पार्टी संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले हरेंद्र सिंह को भाजपा के समर्पित और अनुभवी नेताओं में गिना जाता है। उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ-साथ उनके पिता दिवंगत विधायक नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा का अत्यंत करीबी सहयोगी भी माना जाता रहा है, जिससे क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक समझ का उन्हें लंबा अनुभव प्राप्त है। उनके बारे में ये भी चर्चा है कि वे नवीन सिन्हा का पूरा चुनाव मैनेज करते थे। हरेंद्र सिंह जैसे संगठन आधारित नेताओं का अनुभव, रणवीर नंदन की सामाजिक-शैक्षणिक पहचान और ऋतुराज सिन्हा जैसे अपेक्षाकृत युवा चेहरे की संभावनाएं ये सभी भाजपा नेतृत्व के सामने अलग-अलग विकल्प प्रस्तुत करते हैं। वहीं कायस्थ समाज की दावेदारी भी इस समीकरण को और रोचक बना रही है।

BJP के सामने कठिन लेकिन महत्वपूर्ण फैसला

बांकीपुर सीट पर टिकट का फैसला भाजपा के लिए आसान नहीं दिखाई देता। एक ओर संगठन को वर्षों देने वाले अनुभवी नेता हैं, दूसरी ओर सामाजिक प्रतिनिधित्व की मांग है और साथ ही युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की राजनीतिक आवश्यकता भी है। बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा, इसका फैसला आने वाले समय में होगा, लेकिन इतना तय है कि यह चयन केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह भाजपा की संगठनात्मक प्राथमिकताओं, सामाजिक संतुलन और भविष्य की राजनीतिक दिशा का भी संकेत देगा। प्रतिष्ठा, परंपरा, सामाजिक समीकरण और नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं के बीच बांकीपुर आज बिहार की सबसे चर्चित राजनीतिक सीटों में से एक बन चुकी है। आने वाले दिनों में यहां का राजनीतिक घटनाक्रम पूरे राज्य की राजनीति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा।

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