World Zoonoses Day 2025: जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों के प्रति जागरूकता की पहल

Desk: हर साल आज यानी 6 जुलाई को विश्व जूनोसिस दिवस (World Zoonoses Day) मनाया जाता है, जो न केवल इंसानों और जानवरों के बीच फैलने वाले संक्रामक रोगों की गंभीरता को रेखांकित करता है, बल्कि यह दिन विज्ञान की एक ऐतिहासिक उपलब्धि – लुई पाश्चर (Louis Pasteur) द्वारा पहली रेबीज वैक्सीन के सफल उपयोग – को भी याद करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया के लगभग 60% संक्रामक रोग जूनोटिक होते हैं, यानी ये जानवरों से इंसानों में फैलते हैं। इनमें रेबीज, निपाह, एवियन फ्लू, स्वाइन फ्लू और कई तरह के कोरोना वायरस शामिल हैं।

6 जुलाई 1885 को लगा था पहला रेबीज वैक्सीन
फ्रांस के वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने 6 जुलाई 1885 को एक लड़के को रेबीज वैक्सीन देकर उसकी जान बचाई थी। यह चिकित्सा विज्ञान के इतिहास का वह क्षण था, जिसने जूनोटिक रोगों की रोकथाम के लिए टीकाकरण की नींव रखी।

थीम 2025: “One World, One Health: Prevent Zoonoses”
इस साल की थीम दुनिया को एकजुट दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित करती है – कि इंसान, जानवर और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हैं और इनका स्वास्थ्य भी परस्पर निर्भर है।

क्या हैं जूनोटिक रोग?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, सभी संक्रामक रोगों में से 60% से अधिक रोग जूनोटिक होते हैं। इनमें शामिल हैं:

  • रेबीज
  • बर्ड फ्लू (Avian Influenza)
  • स्वाइन फ्लू
  • निपाह वायरस
  • कोविड-19
  • ब्रुसेलोसिस
  • ईबोला
  • लेप्टोस्पायरोसिस
  • टॉक्सोप्लाज्मोसिस

रेबीज के खिलाफ बड़ी जीत की ओर
भारत में रेबीज के मामलों में हाल के वर्षों में 75% की गिरावट दर्ज की गई है, फिर भी हर साल लगभग 5,700 लोगों की इस बीमारी से मौत हो जाती है। सरकार ने WHO के सहयोग से 2030 तक देश को रेबीज मुक्त करने का लक्ष्य रखा है।

निपाह और इन्सेफलाइटिस: नए युग की घातक बीमारियां
केरल में निपाह वायरस के प्रकोप और उत्तर भारत में इन्सेफलाइटिस की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि वायरस अब अधिक जटिल रूप ले रहे हैं।

मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां अभी भी चुनौती
साल 2024 में देश में डेंगू के 2.33 लाख से अधिक मामले और लगभग 300 मौतें दर्ज की गईं। मलेरिया और चिकनगुनिया के मामले भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं।

जागरूकता और बचाव ही सबसे बड़ा हथियार
इस दिन देशभर में स्कूलों, कॉलेजों और मेडिकल संस्थानों में सेमिनार, हेल्थ कैम्प, टीकाकरण अभियान और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से जनजागृति फैलायी जाती है। विशेषज्ञों द्वारा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पशुपालन से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण और जानकारी दी जाती है।

आज की चुनौतियां और समाधान
आज, जब दुनिया कोविड-19 जैसी महामारियों के अनुभव से गुजर चुकी है, जूनोटिक रोगों से लड़ाई और भी ज़रूरी हो गई है। भारत सहित कई देश ‘वन हेल्थ’ मॉडल पर काम कर रहे हैं। जिसमें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण की सेहत को एक ही दृष्टिकोण से देखा जाता है।

‘वन हेल्थ मिशन’ से जुड़े वैज्ञानिक और संस्थान
भारत सरकार ने नेशनल वन हेल्थ मिशन (NOHM) की शुरुआत की है, जिसमें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण की सेहत को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। नागपुर में देश का पहला वन हेल्थ इंस्टीट्यूट बन रहा है और 20 से ज्यादा शोध परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें ICAR और IISc जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं।

 

 

 

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