Desk. सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने पति से गुजारा भत्ता मांगने की हकदार है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 धर्मनिरपेक्ष पर हावी नहीं होगा।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने शीर्ष अदालत में एक मुस्लिम व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक मुस्लिम महिला के अधिकार को बरकरार रखते हुए फैसले सुनाए, जिसमें उसकी पूर्व पत्नी को 10 हजार रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती दी गई थी।
अदालत ने कथित तौर पर यह भी फैसला सुनाया कि यदि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत किसी आवेदन के लंबित रहने के दौरान एक मुस्लिम महिला का तलाक हो जाता है तो वह मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 का सहारा ले सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ‘मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य’ मामले से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता (पति) ने अपनी पूर्व पत्नी (जिससे उसने 2017 में तलाक ले लिया था) द्वारा भरण-पोषण की मांग करने पर शिकायत की थी। प्रारंभ में एक पारिवारिक अदालत ने अब्दुल समद को अपनी पूर्व पत्नी को प्रति माह 20 हजार का अंतरिम गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था।
हालांकि, उन्होंने इस फैसले को तेलंगाना उच्च न्यायालय के समक्ष इस आधार पर चुनौती दी थी कि उनका का तलाक मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार हुआ था। बार और बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के मद्देनजर एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत किसी भी गुजारा भत्ते का दावा करने की हकदार नहीं है।
इसके बाद उच्च न्यायालय ने गुजारा भत्ता घटाकर 10 हजार प्रति माह कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता पति ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


















