- राजा को युवाओं का संदेश: “ऐ राजाजी, काहे नहीं सुनते हैं?” – झारखंड के युवाओं की चुप्पी अब तख्तियों पर बोल रही है
रांची: झारखंड की सड़कों पर इन दिनों सत्ता की ‘बहरी चुप्पी’ के खिलाफ युवाओं की आवाज गूंज रही है। ये वही युवा हैं जो कल देश का प्रशासन संभालने की तैयारी कर रहे थे, आज वहीं युवा खुद के भविष्य के लिए अनशन पर बैठे हैं। जेपीएससी की परीक्षा में दस महीनों से अटका एक परिणाम अब सिर्फ तकनीकी देरी नहीं, बल्कि एक नीतिगत उदासीनता का प्रतीक बन चुका है।
सरकार की जुबान पर ‘विकास’ का राग है और ज़मीन पर युवाओं के सपनों की राख। मुख्यमंत्री महोदय कहते हैं – “जल्द ही आएगा परिणाम!” लेकिन ये “जल्द” कब आएगा, इसका कोई कैलेंडर अब छात्रों के पास नहीं बचा।
युवाओं ने मेहनत से जीवन का मसौदा तैयार किया था, लेकिन अफसरशाही की स्याही उसमें इम्तिहान की अनंत प्रतीक्षा भरकर छोड़ गई। क्या अब झारखंड में सरकारी नौकरी पाना लॉटरी जीतने जितना दुर्लभ हो गया है?
“राजाजी, हमनें मां की ममता छोड़ी, गांव की मिट्टी छोड़ी, बचपन के खेल छोड़े, प्रेम की कहानियां छोड़ीं – सब सिर्फ इस सिस्टम पर भरोसा करके। लेकिन अब जब परिणाम मांगा, तो आप कहते हैं ‘विचाराधीन है’?”
अगर ‘विचार’ ही करते रहेंगे तो ‘रोज़गार’ कब देंगे? क्या सरकार यह मान चुकी है कि परीक्षा पास करने वाले युवाओं को ‘धैर्य प्रतियोगिता’ भी पास करनी होगी?
वो छात्र जिनके हाथों में कल संविधान होना था, आज नारे हैं। वो जो कभी राष्ट्र निर्माण के सपने देखते थे, अब सरकार की नींद तोड़ने की जद्दोजहद में हैं।
ऐ राजाजी, ये सत्ता का सिंहासन क्या आपको ऊंचा कर गया है या जनता की पुकार अब ज़मीन से ऊपर नहीं पहुंचती?
जेपीएससी की देरी अब प्रशासनिक नहीं, नैतिक विफलता है। और ये विफलता सत्ता के हर उस कोने में दर्ज हो रही है, जहां से जनता को जवाब मिलना चाहिए।
राजाजी, अगर आप अब भी नहीं सुनेंगे, तो इतिहास सुन लेगा। तब यह भी लिखा जाएगा कि जब युवाओं की उम्मीदें टूट रही थीं, तब आप चुप थे – और आपकी चुप्पी भी गूंज रही थी।
“ऐ राजाजी, काहे नहीं सुनते हैं?” – अब यह महज़ सवाल नहीं, बल्कि चेतावनी है।



















