रांची: झारखंड के स्कूली शिक्षा विभाग की एक हालिया कार्रवाई ने राज्यभर के करीब 4000 पारा शिक्षकों की आजीविका पर संकट खड़ा कर दिया है। इनमें से 153 शिक्षक केवल दुमका जिले से हैं, जबकि गिरिडीह में 269 और देवघर में 98 पारा शिक्षकों को अप्रैल 2025 से वेतन बंद कर दिया गया है। इन सभी को एक चिट्ठी के माध्यम से बर्खास्तगी की सूचना दी गई है, जिसमें कहा गया है कि उनके द्वारा प्राप्त की गई डिग्री “अवैध” संस्थानों से है।
दो बार वेरिफिकेशन के बाद भी ‘फर्जी’ करार?
साल 2001-03 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत ग्राम शिक्षा समिति के माध्यम से पारा शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी, जहां न्यूनतम योग्यता मैट्रिक रखी गई थी। वर्ष 2005 में यह योग्यता बढ़ाकर इंटरमीडिएट कर दी गई। लेकिन कार्यरत शिक्षकों को सरकार ने न तो अवकाश दिया और न ही यह निर्देश कि वे किस संस्थान से पढ़ाई करें। ऐसे में अधिकांश शिक्षकों ने “नॉन अटेंडिंग” संस्थानों—जैसे प्रयाग महिला विद्यापीठ (उत्तर प्रदेश), हिंदी विद्यापीठ (इलाहाबाद), आदि—से डिग्री प्राप्त की।
शिक्षकों का कहना है कि इन डिग्रियों को विभाग ने खुद वेरिफाई किया था, वेतनमान चालू किया गया और बाद में जब 2022 में सेवा शर्त नियमावली बनी, तब पुनः इन डिग्रियों का फिजिकल वेरिफिकेशन विभागीय प्रतिनिधियों के माध्यम से संस्थानों में जाकर कराया गया। इसके बाद ही उन्हें आकलन परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली थी।
संभावित कार्रवाई और मांगें:
शिक्षकों की मांग है कि या तो सरकार उनकी डिग्रियों को वैध घोषित करे (जैसा कि पहले किया गया था), या उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था में समायोजित किया जाए।
बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर वेतन पुनः चालू किया जाए।
समान और स्पष्ट प्रक्रिया लागू हो ताकि सभी जिलों में एक जैसी नीति अपनाई जाए।
लोन लिया, ट्रेनिंग दी गई, फिर नौकरी पर खतरा क्यों?
डिग्री वेरिफिकेशन के बाद इन शिक्षकों को EPF की सुविधा, 4% वार्षिक वेतन वृद्धि और बैंक लोन की पात्रता जैसी सुविधाएं मिलीं। कई शिक्षक इन मानकों के आधार पर बैंकों से लाखों रुपये का लोन भी ले चुके हैं। लेकिन अप्रैल 2025 में मानव संसाधन विकास विभाग के एसडी तिग्गा द्वारा सभी जिलों को भेजी गई एक चिट्ठी में पांच संस्थानों की डिग्रियों को अवैध बताया गया है, और उनके आधार पर शिक्षकों को बर्खास्त करने के आदेश दिए गए हैं।
एसएमसी को नहीं है बर्खास्त करने का अधिकार
शिक्षकों की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि उन्हें बर्खास्त करने का आदेश स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) द्वारा दिया जा रहा है, जबकि नियमानुसार यह अधिकार SMC को नहीं है। शिक्षक यह भी कह रहे हैं कि बर्खास्तगी की प्रक्रिया स्पष्ट और समान नहीं है। जैसे पश्चिमी सिंहभूम जिले में सिर्फ हिंदी विद्यापीठ की डिग्रियों को अवैध माना गया है, जबकि बाकी जिलों में सभी पांच संस्थानों की डिग्रियों को खारिज किया गया है।
सरकार का रवैया विरोधाभासी
एक ओर जहां शिक्षकों को बर्खास्त किया गया है, वहीं दूसरी ओर विभाग अभी भी उनसे रिपोर्टिंग कार्य, एमडीएम वितरण और प्रशिक्षण जैसे काम ले रहा है। अप्रैल 2025 से वेतन बंद कर दिया गया है, जबकि सेवाएं अब भी जारी हैं।
शिक्षकों की पीड़ा
शिक्षकों का कहना है कि जब विभाग को इन संस्थानों की मान्यता की जांच करने में 20 से 25 साल लग गए, तो उनसे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे 2005 में ही यह जान लेते कि कौन सा संस्थान वैध है?


















