गयाजी : बिहार के गयाजी में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कुरान है। कुरान मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए अल्लाह की भेजी गई सबसे पाक ग्रंथ है। 18वीं शताब्दी में दुनिया की सबसे बड़ी कुरान की तीन प्रतियां छापी गई थी। उस समय प्रिंटिंग का दौर शुरू ही हुआ था। इन तीन प्रतियों में एक प्रति अंग्रेेज लेकर चले गए थे और ब्रिटेन के ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में वहां इसकी एक प्रति है। दूसरी मौलाना आजाद लाइब्रेरी, यूपी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और तीसरी प्रति बिहार के गयाजी के खानकाह में सुरक्षित है। इस तरह बिहार के गयाजी के खानकाह में दुनिया की सबसे बड़ी प्रिंटिंग की हुई कुरान की प्रति आज भी सुरक्षित है।

गयाजी के इस खानकाह में लाइब्रेरी, इसमें दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह, दुनिया की सबसे बड़ी कुरान सुरक्षित
गयाजी के नवागढी के समीप चिश्तिया मोनामिया खानकाह है। इस खानकाह में हजारों किताबें सुरक्षित है। इसमें 600 से 700 पांडुलिपियों भी है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ‘कुरान ए पाक’ भी यहां है, जो करीब डेढ़ सौ साल पुराना है। इस खानकाह में ‘कुरान ए पाक’ को अत्यंत ही सुरक्षित रखा गया है। खास बात यह है कि यह प्रिंटिंग की हुई ‘कुरान ए पाक’ है, उस समय देश में प्रिंटिंग का दौर शुरू हुआ था। सन 1793 में इसे हाथों से लिखा गया था और फिर 80-90 सालों तक यह पांडुलिपि की शक्ल में रही। 1882 के आसपास में दिल्ली के सबसे बड़े प्रिंटिंग प्रेस मयूर प्रेस में विश्व की सबसे बड़े कुरान की तीन प्रतियां छपी। यह 1152 पन्नों की विश्व की सबसे बड़ी कुरान थी।
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1793 में हाथों से लिखी गई थी, 1882 में हुई थी प्रिंटिंग
दुनिया के तीन जगह पर 1152 पन्नों की सबसे बड़ी कुरान है, जिसमें एक गयाजी के चिश्तिया मोनामिया खानकाह में है। करीब डेढ़ सौ साल पुरानी यह कुरान बताई जाती है। 1882 के आसपास दिल्ली के मयूर प्रेस में 1152 पन्नों के विश्व के सबसे बड़े कुरान की प्रिंटिंग हुई थी। अंग्रेज जब हिंदुस्तान में शासन चला रहे थे, तब एक प्रति इंग्लैंड में चली गई जो कि ब्रिटिश लाइब्रेरी में आज भी मौजूद है। वहीं, इसकी दूसरी प्रति आजाद लाइब्रेरी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी यूपी और तीसरी प्रति बिहार के गयाजी में चिश्तिया मोनामिया खानकाह में है। इसे हिंदुस्तान के प्रसिद्ध इस्लामिक स्कॉलर शाह अब्दुल अजीज मोहदिस देहलवी और शाह रफीउद्दीन मोहदिज देहलवी ने 1793 के आसपास में लिखा था। हाथों से लिखी यह किताब उस समय के हिंदुस्तान और अरब में प्रसिद्ध हुई थी। बाद में यह 1882 के आसपास में मयूर प्रेस दिल्ली में प्रिंटेड होकर तैयार हुई। उस समय प्रिंटिंग क्रांति भारत में शुरू हुई थी और यह दुर्लभ कुरान की प्रति यहां प्रिंटेड हुई थी। यह विश्व भर में दुर्लभ कुरान की प्रति थी, जो कि गयाजी में आज भी सुरक्षित रखी हुई है।
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आशीष कुमार की रिपोर्ट
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