Bhagalpur Teacher Jhalmudi Stall: सरकारी शिक्षक की नौकरी को आमतौर पर सुरक्षित और सम्मानजनक माना जाता है, लेकिन भागलपुर के सन्हौला प्रखंड से सामने आई कहानी आर्थिक चुनौतियों की अलग तस्वीर दिखाती है। अमडंडा मध्य विद्यालय में शारीरिक शिक्षक एवं स्वास्थ्य अनुदेशक के रूप में कार्यरत निशांत कुमार स्कूल में बच्चों को पीटी और खेलकूद की ट्रेनिंग देते हैं। वहीं, स्कूल की ड्यूटी खत्म होने के बाद परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें झालमुड़ी और स्टेशनरी बेचनी पड़ती है।
2022 में हुई थी नियुक्ति, अब 16 हजार रुपये मानदेय
निशांत कुमार की नियुक्ति वर्ष 2022 में शारीरिक शिक्षक एवं स्वास्थ्य अनुदेशक के पद पर हुई थी। शुरुआत में उन्हें 8 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता था। करीब तीन साल तक मानदेय बढ़ाने की मांग और संघर्ष के बाद इसे बढ़ाकर 16 हजार रुपये प्रतिमाह किया गया। हालांकि, निशांत कुमार का कहना है कि मौजूदा महंगाई में 16 हजार रुपये की आय से परिवार का राशन, बच्चों की जरूरतें और रोजमर्रा के खर्च पूरे करना मुश्किल है। इसी वजह से उन्हें स्कूल के बाद अतिरिक्त काम करना पड़ रहा है।
स्कूल के बाद लगाते हैं झालमुड़ी की दुकान
निशांत कुमार स्कूल में बच्चों को अनुशासन, पीटी और खेलकूद की ट्रेनिंग देने के बाद स्कूल के बाहर छोटी सी दुकान लगाते हैं। यहां वह झालमुड़ी के साथ स्टेशनरी का सामान बेचते हैं। उनके अनुसार, शुरुआत में स्कूल के बाहर दुकान लगाने में झिझक और संकोच महसूस होता था, लेकिन परिवार की जरूरतों के आगे यह भावना धीरे-धीरे खत्म हो गई। दुकान से उन्हें रोजाना करीब 300 से 400 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।
जिन बच्चों को सुबह PT कराते हैं, वही शाम को खरीदते हैं झालमुड़ी
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि जिन बच्चों को निशांत कुमार सुबह स्कूल में पीटी और खेलकूद की ट्रेनिंग देते हैं, उनमें से कई बच्चे शाम को उनकी दुकान पर झालमुड़ी खरीदने पहुंचते हैं। अमडंडा मध्य विद्यालय के छात्रों का कहना है कि उनके पीटी सर उन्हें अच्छी ट्रेनिंग देते हैं। हालांकि, उन्हें अपने शिक्षक को स्कूल के बाद झालमुड़ी बेचते देखकर अच्छा नहीं लगता। छात्र भी चाहते हैं कि सरकार शिक्षकों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनका मानदेय बढ़ाए।
पूर्णकालिक शिक्षक का दर्जा देने की मांग
निशांत कुमार की मांग है कि शारीरिक शिक्षकों और स्वास्थ्य अनुदेशकों को अंशकालिक व्यवस्था से बाहर निकालकर पूर्णकालिक शिक्षक का दर्जा दिया जाए। साथ ही मानदेय में भी उचित बढ़ोतरी की जाए, ताकि उन्हें परिवार का खर्च चलाने के लिए अतिरिक्त काम करने की जरूरत न पड़े। उनका कहना है कि उनका मुख्य काम बच्चों को बेहतर शारीरिक प्रशिक्षण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना है, लेकिन कम आय के कारण स्कूल के बाद दूसरी गतिविधि करना मजबूरी बन गया है।
कम मानदेय से कई शिक्षक परेशान
निशांत कुमार का मामला अकेला नहीं है। बिहार में कम मानदेय के कारण कई शारीरिक शिक्षक और स्वास्थ्य अनुदेशक आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। कुछ शिक्षक स्कूल के बाद डिलीवरी का काम कर रहे हैं तो कुछ अन्य छोटे-मोटे कामों के जरिए अतिरिक्त आमदनी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में शारीरिक शिक्षकों और स्वास्थ्य अनुदेशकों की मांग है कि उनकी सेवा शर्तों और मानदेय पर सरकार गंभीरता से विचार करे, ताकि उन्हें अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए अतिरिक्त रोजगार पर निर्भर न रहना पड़े।

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