Gayaji Pitru Paksha AI: विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला अब अंतिम सप्ताह में पहुंच गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए गयाजी पहुंचकर पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं। इस बार मेले में एशिया और यूरोप से भी विदेशी श्रद्धालु पहुंचे और सनातनी परंपरा के अनुसार अपने पूर्वजों की शांति के लिए पूजा-अर्चना और तर्पण किया। गयाजी प्रशासन के अनुसार, इस वर्ष पहली बार AI आधारित भाषा अनुवाद की सुविधा शुरू की गयी। इसके माध्यम से अब तक 9,070 देशी-विदेशी श्रद्धालुओं को विष्णुपद मंदिर में पूजा-अर्चना के दौरान मदद मिली। भाषा की बाधा दूर होने से विदेशी श्रद्धालु पंडितों के निर्देशों को आसानी से समझ सके और निर्धारित विधि-विधान के अनुसार पूजा, तर्पण और पिंडदान संपन्न किया।
विदेशों से गयाजी पहुंचे श्रद्धालु, किया पिंडदान
विदेशी श्रद्धालुओं की पूजा कराने वाले एक पंडित के अनुसार, रूस, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी समेत कई देशों से लोग गयाजी पहुंचे हैं। श्रद्धालुओं ने अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए फल्गू नदी में जल अर्पित किया और विधि-विधान के साथ तर्पण एवं पिंडदान किया। पितृपक्ष मेले में शामिल एक विदेशी श्रद्धालु ने बताया कि गयाजी में पिंडदान का यह अनुभव उनके लिए बिल्कुल नया था। उन्होंने कहा कि पूर्वजों के पिंडदान की परंपरा के बारे में वे कई वर्षों से सुनते आ रहे थे और इस बार इसे विधिपूर्वक पूरा करने का अवसर मिला। उनके अनुसार, पूजा और तर्पण के बाद उन्हें जीवन और मृत्यु को समझने का एक अलग अनुभव हुआ। उन्होंने इस अनुभव को अपने जीवन की ऐसी स्मृति बताया, जिसे वह लंबे समय तक अपने साथ रखेंगे।
विदेशी महिलाओं ने भी की पूर्वजों की शांति के लिए प्रार्थना
गयाजी में कई विदेशी महिलाएं भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने पहुंचीं। उन्होंने बताया कि उनके लिए यह पहला ऐसा अनुभव था और इसे वे हमेशा याद रखेंगी। विदेशी श्रद्धालुओं ने कहा कि भले ही यह परंपरा उनके संस्कारों का हिस्सा नहीं रही हो, लेकिन गयाजी में परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्मा की शांति के लिए पूजा करने से उन्हें मानसिक शांति का अनुभव हुआ। उन्होंने भारत आकर पितृपक्ष मेले में शामिल होने को भगवान से जुड़ने का अवसर बताया।

AI ने दूर की भाषा की बाधा
पितृपक्ष मेले में AI आधारित भाषा अनुवाद की सुविधा ने विदेशी श्रद्धालुओं के लिए पूजा की प्रक्रिया को समझना आसान बनाया। पंडितों के निर्देशों को समझने में भाषा संबंधी परेशानी कम होने से विदेशी श्रद्धालु निर्धारित विधि-विधान के अनुसार पूजा और तर्पण कर सके। इस पहल के जरिए तकनीक और धार्मिक आयोजन का एक ऐसा मेल देखने को मिला, जिसने अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले श्रद्धालुओं के लिए तीर्थयात्रा को सुविधाजनक बनाया।
444 पेड़ लगाए गए, 40,161 श्रद्धालुओं को मिला गंगाजल
पितृपक्ष मेले के दौरान पर्यावरण संरक्षण और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़े काम भी किए जा रहे हैं। पर्यावरण की स्वच्छता के तहत ‘एक पेड़ पूर्वज के नाम’ अभियान के तहत अब तक 444 पेड़ लगाए जा चुके हैं। इसके अलावा अब तक कुल 40,161 तीर्थयात्रियों के बीच गंगाजल का वितरण किया गया है। मेले में 1,00,700 लोगों को मेडिकल उपचार भी दिया गया है। गंगाजल वितरण और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को मिली चिकित्सा सुविधा से मेले की व्यवस्थाओं को मजबूती मिली है। इस तरह गयाजी का पितृपक्ष मेला आस्था और परंपरा के साथ तकनीक, सेवा और पर्यावरण संरक्षण के समन्वय का उदाहरण पेश कर रहा है।


















