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Bihar Deaddiction Centres Skill Training: नशामुक्ति केंद्रों से इलाज के बाद युवाओं को मिलेगा कौशल प्रशिक्षण, रोजगार से जोड़ने की तैयारी

Bihar Deaddiction Centres Skill Training, पटना: बिहार में नशामुक्ति अभियान को और प्रभावी बनाने के साथ नशे की लत से उबर रहे युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में नई पहल की जा रही है। राज्य के नशामुक्ति केंद्रों में उपचार कराने वाले युवाओं को कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और आजीविका के अवसरों से जोड़ने की योजना तैयार की जा रही है। इसके साथ ही केंद्रों में काउंसलिंग, चिकित्सा और पुनर्वास की सुविधाओं को भी मजबूत किया जाएगा, ताकि इलाज के बाद युवाओं को सामान्य जीवन में लौटने और दोबारा नशे की गिरफ्त में जाने से बचाने में मदद मिल सके। समाज कल्याण विभाग के सचिव विनोद सिंह गुंजियाल ने सोमवार, 2 नवंबर को पटना के दशरथ मांझी श्रम नियोजन एवं अध्ययन संस्थान में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशाला में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विभाग इस दिशा में विशेष कार्ययोजना को जल्द अंतिम रूप देगा। कार्यशाला का आयोजन सामाजिक सुरक्षा निदेशालय की ओर से किया गया था।

9,527 जागरूकता कार्यक्रमों से 8.46 लाख लोगों तक पहुंचा संदेश

कार्यशाला में नशामुक्त भारत अभियान, दिव्यांगजनों के कल्याण, दिव्यांगता के क्षेत्र में शुरुआती हस्तक्षेप और विकसित भारत के लिए सुगम्य भारत अभियान पर विस्तार से चर्चा हुई। सचिव ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान बिहार में नशामुक्ति को लेकर 9,527 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इनके माध्यम से कुल 8 लाख 46 हजार 177 लोगों तक नशे के दुष्प्रभावों और नशामुक्त जीवन का संदेश पहुंचाया गया। उन्होंने कहा कि राज्य में संचालित 13 नशामुक्ति केंद्रों की उपचार व्यवस्था, सुविधाओं और कार्यप्रणाली की नियमित निगरानी की जाएगी। केंद्रों में प्रशिक्षित काउंसलर और चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ पुनर्वास की व्यवस्था को भी बेहतर बनाने पर जोर रहेगा। विभागीय सचिव ने बताया कि कार्यशाला में अलग-अलग विभागों और विशेषज्ञों से मिले सुझावों को राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला में प्रस्तुत किया जाएगा। इससे संबंधित योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी।

101 बुनियाद केंद्रों पर दिव्यांगता की शुरुआती पहचान की तैयारी

दिव्यांग बच्चों की समय पर पहचान और उपचार सुनिश्चित करने के लिए राज्य के 101 बुनियाद केंद्रों पर स्वास्थ्य संबंधी स्क्रीनिंग शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। फिलहाल राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत बिहार के नौ प्रमंडलों में जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों पर बच्चों में 44 प्रकार की स्वास्थ्य स्थितियों की जांच की जाती है। अब इसी व्यवस्था को बुनियाद केंद्रों तक विस्तारित करने की तैयारी है। कार्यशाला में बताया गया कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिहाज से शून्य से छह वर्ष की उम्र बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस अवधि में किसी तरह की दिव्यांगता या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी की पहचान हो जाए तो समय रहते उपचार और आवश्यक हस्तक्षेप किया जा सकता है। इससे बच्चों के विकास और जीवन की गुणवत्ता में सुधार की संभावना बढ़ती है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, देश में 2.68 करोड़ और बिहार में 23.31 लाख दिव्यांगजन थे। ऐसे में शुरुआती पहचान और समय पर उपचार की व्यवस्था को व्यापक बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

दिव्यांगजनों के लिए खरीदी जाएंगी 14 सुगम्य बसें

सुगम्य भारत अभियान के तहत दिव्यांगजनों के लिए सार्वजनिक स्थानों और परिवहन सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। विभाग के अनुसार, बिहार में अब तक 44,755 सार्वजनिक संस्थानों और 45 वेबसाइटों को दिव्यांगजनों के अनुकूल बनाया जा चुका है। इसके अलावा राज्य के 15 बस स्टैंडों को भी सुगम्य बनाया गया है। दिव्यांगजनों की यात्रा संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 14 सुगम्य बसों की खरीद प्रक्रिया भी चल रही है। इन बसों का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन में दिव्यांगजनों की पहुंच और आवागमन को सुविधाजनक बनाना है। विनोद सिंह गुंजियाल ने कहा कि जागरूकता बढ़ाने, समय पर उपचार उपलब्ध कराने और सार्वजनिक सुविधाओं को सुलभ बनाने से ही समावेशी समाज का निर्माण संभव है। इसके लिए सभी संबंधित विभागों को मिलकर काम करना होगा।

नशे की लत से उबरने के लिए चिकित्सा के साथ काउंसलिंग भी जरूरी

कार्यशाला में नालंदा मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. संतोष ने नशे की लत को एक जटिल समस्या बताया। उन्होंने कहा कि नशे की निर्भरता केवल शारीरिक परेशानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण भी जुड़े होते हैं। इसलिए इसका उपचार भी समग्र तरीके से किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद सभी 38 जिलों में एक-एक नशामुक्ति इकाई शुरू की गई थी। पटना में दो केंद्र स्थापित किए गए थे। नालंदा मेडिकल कॉलेज स्थित नशामुक्ति केंद्र में अब तक करीब 13,500 मरीजों का ओपीडी में उपचार किया जा चुका है। वहीं, 3,500 से 4,000 मरीजों को भर्ती कर इलाज दिया गया है। कार्यशाला में महिला एवं बाल विकास निगम की प्रबंध निदेशक इनायत खान, सामाजिक सुरक्षा निदेशालय की निदेशक डॉ. प्रीति, दिव्यांगजन सशक्तीकरण निदेशालय की निदेशक अंजलि शर्मा सहित विभिन्न विभागों के पदाधिकारी और प्रतिनिधि मौजूद रहे। विशेषज्ञों ने नशामुक्ति, दिव्यांगजन कल्याण और सुगम्य सुविधाओं के विस्तार को लेकर सुझाव दिए।

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