Election Promise Debate: तमिलनाडु में विजय सरकार ने तुरंत लागू किये वादे, झारखंड में ‘सात गारंटी’ पर उठे सवाल

तमिलनाडु में विजय सरकार ने शपथ के बाद चुनावी वादों पर अमल शुरू किया, जबकि झारखंड में महागठबंधन की सात गारंटियों पर सवाल उठ रहे हैं।


Election Promise Debate रांची: तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ घंटों के भीतर ही चुनावी घोषणा पत्र के प्रमुख वादों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिये। उनकी सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने, महिलाओं की सुरक्षा के लिये विशेष टास्क फोर्स गठित करने और नशे के खिलाफ अभियान शुरू करने जैसे फैसले लिये हैं।

वहीं दूसरी ओर झारखंड में ‘एक वोट, सात गारंटी’ के सहारे सत्ता में लौटी महागठबंधन सरकार पर अब अपने ही वादों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सरकार के 18 महीने पूरे होने वाले हैं, लेकिन 450 रुपये में गैस सिलिंडर और किसानों को 3200 रुपये न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी कई प्रमुख घोषणाएं अब भी अधूरी हैं।

Election Promise Debate:अपने ही मंत्री ने दिलाई घोषणा पत्र की याद

स्थिति यह है कि अब सरकार के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनावी घोषणा पत्र की याद दिलायी है।

झामुमो, कांग्रेस, राजद और वामदलों के समर्थन वाले इंडिया गठबंधन ने विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं, किसानों, युवाओं, आदिवासियों और गरीब परिवारों को केंद्र में रखकर सात बड़ी गारंटियां घोषित की थीं। इनमें रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक राहत से जुड़े कई बड़े वादे शामिल थे।


Key Highlights

  • तमिलनाडु में विजय सरकार ने शपथ के तुरंत बाद लागू किये चुनावी वादे

  • झारखंड में ‘एक वोट, सात गारंटी’ पर बढ़े सवाल

  • 450 रुपये गैस सिलिंडर और MSP वादा अब भी अधूरा

  • वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने याद दिलाया घोषणा पत्र

  • चुनावी वादों की जवाबदेही पर फिर शुरू हुई बहस


Election Promise Debate:कुछ योजनाओं में तेजी, कई वादे अब भी अधूरे

सरकार की ओर से कुछ योजनाओं पर काम जरूर हुआ है, लेकिन कई अहम वादों पर अब तक स्पष्ट प्रगति नहीं दिखी है। विपक्ष लगातार सरकार पर चुनावी घोषणाओं को पूरा नहीं करने का आरोप लगा रहा है।

अब तक राज्य सरकार ने यह सार्वजनिक नहीं किया है कि सात गारंटियों की समीक्षा कितनी बार हुई, किस विभाग को कौन-सा लक्ष्य दिया गया और योजनाओं के क्रियान्वयन की समयसीमा क्या तय की गयी थी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी घोषणा पत्र अब केवल वादों का दस्तावेज नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक नैरेटिव तय करने का बड़ा माध्यम बन चुका है। हालांकि सत्ता में आने के बाद इन वादों की जवाबदेही तय करने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं दिखती।

Election Promise Debate:तमिलनाडु मॉडल बनाम झारखंड की चुनौती

तमिलनाडु में विजय सरकार द्वारा शपथ के तुरंत बाद लिये गये फैसलों की तुलना अब झारखंड से की जा रही है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि चुनावी वादों पर त्वरित कार्रवाई जनता के बीच सरकार की विश्वसनीयता मजबूत करती है, जबकि देरी होने पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

झारखंड में आने वाले समय में सरकार पर अपने चुनावी वादों को लागू करने का दबाव और बढ़ सकता है।

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