Dhanbad: डिजिटल इंडिया के दौर में जहाँ हम चाँद पर पहुँचने की बात कर रहे हैं, वहीं धनबाद के Tundi से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था को शर्मसार करती है। यहाँ के आदिवासी ग्रामीण आज भी बूंद-बूंद पानी और पक्की सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रहे हैं। आलम यह है कि गाँव में मोबाइल नेटवर्क तक नहीं है, जिससे मुसीबत के वक्त मदद माँगना भी मुमकिन नहीं।
इस आदिवासी गाँव के लोग आज भी आदिम युग जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं
विकास के दावों की पोल खोलती यह तस्वीर धनबाद के Tundi प्रखंड अंतर्गत बैंगनरिया पंचायत के झगरू जमुनिया कोचा गाँव की है। पहाड़ी की तलहटी पर बसे इस आदिवासी गाँव के लोग आज भी आदिम युग जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। गाँव में जल मीनार तो खड़ी है, लेकिन वह महज़ एक ‘शो-पीस’ बनकर रह गई है। ग्रामीण बताते हैं कि वे डांडी चूआ का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। गर्मी के दिनों में जब यह चूआ सूख जाता है, तो पानी के रिसाव के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ता है।
अगर कोई बीमार पड़ जाए या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो, तो ग्रामीणों के पास ‘खटिया’ ही एकमात्र एम्बुलेंस बचती है
गाँव की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है कनेक्टिविटी। मुख्य पथ से गाँव तक आने वाली दो किलोमीटर की सड़क पूरी तरह जर्जर है। बरसात के दिनों में यहाँ गाड़ी चलना तो दूर, पैदल चलना भी दूभर हो जाता है। अगर कोई बीमार पड़ जाए या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो, तो ग्रामीणों के पास ‘खटिया’ ही एकमात्र एम्बुलेंस बचती है।
विडंबना देखिए, जिस दौर में नेटवर्क और इंटरनेट को मूलभूत अधिकार बताया जा रहा है, वहाँ इस गाँव में मोबाइल की घंटियाँ मौन हैं। नेटवर्क न होने के कारण लोग आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या पुलिस को सूचना तक नहीं दे पाते। मूलभूत सुविधाओं के अभाव का असर अब सामाजिक रिश्तों पर भी पड़ने लगा है, जर्जर रास्तों के कारण लोग यहाँ अपनी बेटियों का ब्याह करने से कतराते है।
झगरू जमुनिया कोचा के ग्रामीणों की यह पुकार क्या प्रशासन के कानों तक पहुँचेगी? या फिर चुनाव के वक्त मिलने वाले आश्वासनों की तरह यह गाँव फिर से अंधेरे में खो जाएगा? यह एक बड़ा सवाल है।
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