अब बदलेगी केलांचल की तकदीर, कृषि वैज्ञानिकों से बंधी उम्मीद

Katihar-कभी केला उत्पादन की वजह से केलांचल के रुप में अपनी पहचान रखने वाला कटिहार के किसान इन दिनों केले की खेती से दूर जा रहे हैं. कभी कोढ़ा, कुर्सेला, बरारी, फलका, सेमापुर के इलाके में केला की खेती देखते बनती थी.  कम मेहनत, अधिक मुनाफा और केला के अनुरुप मौसम होने के कारण यह इलाका केले की खेती के अनुकूल थी. किसानों के बीच भी खुशीहाली थी. रोजी-रोटी का संकट नहीं था.  केले की खेती के कारण विस्थापन और बेरोजगारी के दंश से किसान मुक्त थें.

पनामा विल्ट नाम की बीमारी ने ढाया कहर 

लेकिन पनामा विल्ट नाम की बीमारी ने सब कुछ बदल डाला. इस बीमारी ने केले के किसानों के इस कदर परेशान किया किसान केले की खेती से दूर होने में ही अपना भला समक्षा. दरअसल पिछले कुछ सालों से पनामा विल्ट ने केला किसानों के बीच कहर मचा दिया, मजबूरन किसानों को केला की खेती से मुंह मोड़ पड़ा.

किसानों का कहना है कि इस बीमारी में केले के पोधे में अचानक फंगस लगता है औप पौधा सूख कर धराशाई हो जाता है. बेवसी में किसान इसकी खेती से दूर होते गए. पहले केला की खेती किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र था. क्योंकि यह पारंपरिक खेती से अधिक मुनाफा देता था और स्थानीय बाजार से लेकर महानगरों में केला की बड़ी मांग थी.

नेशनल रिसर्च ऑफ बनाना (केला) से किसानों के बीच बढ़ी उम्मीद

लेकिन नेशनल रिसर्च ऑफ बनाना (केला), तमिलनाडु के त्रिचूर से आए वैज्ञानिकों की वजह से किसानों के उदास चेहरे पर एक बार फिर से उम्मीद की किरण जागी है.

इससे पहले 350 से अधिक केला की  विभिन्न वैरायटियों पर  इस इलाके में शोध हो चुका है. इस बार भी इस बीमारी से निजात दिलवाने के लिए डेढ़ सौ से अधिक प्रजातियों पर शोध किया जा रहा है, ताकि केला किसानों को पनामा बिल्ट बीमारी से छुटकारा दिलवाया जा सके. फिलहाल किसानों की उम्मीद कृषि वैज्ञानिकों के रिसर्च पर टिकी हुई है.

 

 

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