महिला सशक्तिकरण की क्यों जरुरत? आज हमारी बारी तो कल आपकी भी हो सकती है

Desk. महिला सशक्तिकरण की बात आई कहां से, पिछले कुछ दशकों से ये जोर-शोर से चल रहा है। भारत का इतिहास स्त्रियों के मामले में काफी गौरवशाली रहा है, त्रेता युग से लेकर कलियुग तक। युद्ध स्थल में हमारी वीरांगनाओं ने कितनी बार पुरुषों के प्राण बचाए हैं। इन महिला विभूतियों में मैत्रेई, गार्गी आदि विदूषियों का नाम है। अहिल्या कलंकित हुई तो पुरुष, शापित हुई तो पुरुष, उद्धार भी पुरुष द्वारा ही संभव हुआ। पद्मावती ने जौहर स्वीकार किया, गुलामी नहीं!

तो फिर महिला सशक्तिकरण क्यों? क्या वो सशक्त नहीं थी? लेकिन ये महिला सशक्तिकरण सरासर व्यक्ति, परिवार और समाज तोड़ने की कोशिश है।

सरकार की पहली इकाई व्यक्ति है, फिर परिवार है, फिर समाज है, तब सरकार है। जब व्यक्ति ही नहीं, परिवार ही नहीं, तो समाज और सरकार का क्या औचित्य है? आज सशक्तिकरण का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है। महज पांच से दस हजार कमाने वाली महिला भी अभिमान से फूली जा रही। मैं महिलाओं की जॉब के विरोध में नहीं, मैं खुद पैंतीस साल से जॉब में हूं। जॉब करने का मतलब होता है, पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर परिवार को आगे बढ़ाना न कि पुरुष और परिवार को लील जाना।

इनकी देखा-देखी अब जो गृहणियां है, वो भी पीछे नहीं, ये एक संक्रामक बीमारी की तरह पूरे समाज में फैलती जा रही है। उल्टे सीधे कानून का दुरूपयोग कर महिलाओं ने थाना पुलिस कोर्ट कचहरी को मनोरंजन का स्थल बना लिया है और पुरूषों को पांव की जूती। मैं सारी महिलाओं की बात नहीं कर रही, सिर्फ बने कानून का दुरूपयोग करने वाली महिला की बात कर रही हूं। आज जब समानता का अधिकार है तो महिला और पुरुष के लिए कानून भी समान होना चाहिए न कि बहू आत्महत्या करें तो ससुराल वाले जेल में सडे़ और दामाद आत्महत्या करें तो ससुराल वाले मस्ती में झूमें।

जान तो जान है किसी की भी जाए, उसके परिवार वालों का हृदय विदीर्ण हो कर चित्कार उठता है। बल्कि ऐसा होना चाहिए कि किसी की भी जान न जाए। महिला सशक्तिकरण से एक महिला का उत्थान बता दें, बल्कि वही बुलंदियों को छू रही है, जिनके सिर पर पति और परिवार का साया है। तो मेरे विचार पर विचार प्रकट करें और साथ में आवाज उठाएं।
महिला सशक्तिकरण कानून खत्म हो, और यदि नहीं तो सरकार फिर से आदिमानव वाली व्यवस्था लागू करें कि शादी ब्याह न कर लोग जानवरों की तरह रहे, क्योंकि वह दिन दूर नहीं कि जब शादी के लिए पुरुष और उसके परिवार वाले दूर से ही हाथ जोड़ लेंगें कि हमें नहीं करनी शादी-वादी।

सुमन झा माहे की कलम से

डिस्क्लेमर:- यह विचार लेखक का खुद का है। इसमें 22Scope News की सहमति की जरुरत नहीं है।

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