Jharkhand State Bar Council Election में 30% Women Reservation लागू: हाई कोर्ट ने सर्विस एक्सटेंशन याचिका खारिज की 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद झारखंड स्टेट बार काउंसिल चुनाव में 30% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. हाईकोर्ट ने ACF सेवा विस्तार याचिका खारिज की.


Jharkhand State Bar Council Election रांची: सुप्रीम कोर्ट के हाल के निर्देशों का सीधा प्रभाव अब झारखंड स्टेट बार काउंसिल के चुनावों पर भी दिखने जा रहा है. देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन राज्य बार काउंसिलों में इस वर्ष चुनाव होने बाकी हैं, उनमें महिलाओं के लिए न्यूनतम 20 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जानी चाहिए. झारखंड में यह प्रतिशत बढ़कर लगभग 30 हो सकता है, क्योंकि काउंसिल में 25 निर्वाचित सदस्य होते हैं और नई व्यवस्था के तहत 7 से 8 सीटें महिला वकीलों के लिए सुरक्षित की जा सकती हैं.

Jharkhand State Bar Council Election

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी प्रार्थी योगमाया एमजी और शेहला चौधरी की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि जहां महिला उम्मीदवार कम हों, वहां 10 प्रतिशत सीटें सह-चयन (co-selection) की प्रक्रिया के माध्यम से भरी जा सकती हैं. सह-चयन वह तरीका है जिसमें प्रत्यक्ष चुनाव के बजाय काउंसिल के मौजूदा या नवनिर्वाचित सदस्य आपसी मतदान से अतिरिक्त सदस्यों का चयन करते हैं. बार काउंसिल चुनावों में यह प्रावधान अब महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.


Key Highlights 

  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद Jharkhand State Bar Council में लगभग 30% सीटें महिला वकीलों के लिए आरक्षित होंगी.

  • 25 निर्वाचित सदस्यों वाली काउंसिल में अब 7 से 8 सीटें women lawyers को मिल सकती हैं.

  • SC ने कहा कि चुनाव शेष राज्यों में 20% सीटें महिला उम्मीदवारों से भरनी होंगी, आवश्यकता पड़ने पर 10% सह-चयन से.

  • सह-चयन उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें मौजूदा या नवनिर्वाचित सदस्य आपसी वोटिंग से अतिरिक्त सदस्यों का चयन करते हैं.

  • झारखंड हाईकोर्ट ने दो सेवानिवृत्त ACF की सेवा विस्तार याचिका खारिज की, कहा service extension को नियम नहीं बनाया जा सकता.

  • अदालत ने राज्य सरकार को पद रिक्त होने से पहले भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की नसीहत दी.


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उधर, एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने दो सेवानिवृत्त सहायक वन संरक्षकों (ACF) की सेवा विस्तार की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया. जस्टिस आनंद सेन की एकल पीठ ने कहा कि सेवा विस्तार को नियम नहीं बनाया जा सकता और यह किसी भी संस्था के स्वस्थ संचालन के लिए उचित नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति तिथि के बारे में पहले से जानती है. ऐसे में सरकार को पद रिक्त होने से पहले ही भर्ती प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए, न कि सेवानिवृत्त कर्मियों को बार-बार विस्तार देकर काम जारी रखने देना चाहिए.

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अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रार्थियों की सेवाएं पहले ही एक जुलाई 2024 से 30 जून 2025 तक बढ़ाई जा चुकी थीं, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सेवा विस्तार को स्थायी व्यवस्था बनाया जा सकता है. न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही की भरपाई सेवा विस्तार से नहीं की जा सकती.

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इन दो अहम आदेशों ने झारखंड की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था में नई दिशा तय की है. एक ओर बार काउंसिल में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की राह खुली है, वहीं दूसरी ओर अदालत ने सेवा विस्तार को अपवाद बताया है, नियम नहीं.

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