कल पंचतत्व में विलीन होंगे विद्रोही कामरेड अतुल अनजान , छात्र आंदोलन से शुरू हुआ था सफर

डिजीटल डेस्कविद्रोही कामरेड अतुल अनजान – जिस उत्तर प्रदेश में शुक्रवार की सुबह से ही सियासत का पारा रायबरेली और अमेठी से कांग्रेस के हाईप्रोफाइल नामांकन को लेकर हाई रहा, उसी प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इंडी गठबंधन के ही घटक दल भाकपा के सचिव रहे विद्रोही कामरेड की छवि वाले कम्यूनिस्ट नेता अतुल अनजान ने अपनी जिंदगी की अंतिम सांस ली। लखनऊ के एक निजी अस्पताल में उनकी सांसों का क्रम टूटा। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे। इसकी जानकारी मिलते ही लखनऊ में उनके हलवासिया स्थित आवास पर शुभचिंतकों का तांता लग गया जिसमें राजनीति, लेखन, पत्रकारिता और समाजसेवा से जुड़े लोग बहुतायत में थे। उन्होंने छात्र आंदोलन ने सियासी सफर की शुरूआत की थी। परिवार के साकेत सिंह ने बताया कि भाकपा के तमाम नेता तत्काल पहुंचने में असमर्थ हैं। सभी शुभचिंतकों के उनके अंतिम दर्शन की इच्छा को ध्यान में रखते हुए शनिवार को लखनऊ के कैसरबाग स्थित भाकपा के राज्य कार्यालय पर दिवंगत अतुल अनजान का पार्थिव शरीर सुबह 10 से अपराह्न 2 बजे तक अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा।  शनिवार अपराह्न 2 बजे भाकपा के लखनऊ कार्यालय से उनकी अंतिम यात्रा शुरू होगी औक गोमती नदी किनारे भैंसाकुंड श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार होगा। उनके पंचतत्व में विलीन होते ही एक विद्रोही कामरेड का अवसान हो जाएगा।

खुली किताब थे विद्रोही कामरेड अतुल अनजान , निजी जैसा कुछ भी नहीं था

अतुल अनजान का पूरा जीवन ही सार्वजनिक था। उसमें निजी जैसा कुछ भी नहीं था। मौजूदा पीढ़ी के लिए वह राजनीति, संविधान, जन-सरोकार, सामाजिक मुद्दों सहित देश-दुनिया के विभिन्न मसले जिनका असर आम जनता पर पड़ सकता है उन सभी विषयों के लिए इनसाइक्लोपीडिया थे। वामपंथी राजनीति के वह बड़ा चेहरा थे। वामपंथी एकता के लिए पूरी प्रतिबद्धता होने के बाद भी अतुल अनजान अन्य विचारधारा वालों से अछूते या कटे हुए नहीं रहते थे। समाजवादी, कांग्रेसी सहित वे सभी समूह जिनका भरोसा आपसी सौहार्द एवं उपेक्षितों या किसानों के प्रति रहता था, उनसे संवाद करने में विद्रोही कामरेड अतुल अनजान कभी नहीं हिचकते थे।

अतुल अनजान का सियासी सफर छात्र आंदोलन से हुआ। वह जेपी आंदोलन के दौरान छात्र राजनीति में आए और अलग पहचान बनाई। वर्ष 1978 में वह लखनऊ विश्वविद्यालय में पहली बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
विद्रोही कामरेड अतुल अनजान

गृह जनपद मऊ से अतुल अनजान का था गहरा लगाव

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिला के निवासी रहे अतुल अनजान का सियासी सफर छात्र आंदोलन से हुआ। वह जेपी आंदोलन के दौरान छात्र राजनीति में आए और अलग पहचान बनाई। वर्ष 1978 में वह लखनऊ विश्वविद्यालय में पहली बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उसके बाद वह लगातार चार बार विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए।

विद्रोही कामरेड अतुल अनजान को अपने गृह जनपद मऊ से बेहद लगाव था। मऊ में उनके प्रयास से 31 दिसंबर 2015 को तत्कालीन समाजवादी सरकार में मुलायम सिंह यादव एवं उस समय मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव ने जनपद के महान विभूति रहे पंडित अलगू राय शास्त्री और कामरेड जय बहादुर सिंह की प्रतिमा की स्थापना मऊ कलेक्ट्रेट परिसर में हुई। विद्रोही कामरेड अतुल अनजान विद्रोही कामरेड अतुल अनजान

दिवंगत विद्रोही कामरेड अतुल अनजान को वरिष्ठ पत्रकारों ने किया याद

कामरेड अतुल अनजान की हजरतगंत काफी हाउस की बैठकी बेहद चर्चित थी। उसमें लखनऊ के सिविल सोसायटी से जुड़े अनेक लोग शामिल होते थे। उनमें नेता, पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफेसर शामिल रहते थे। उनके होने से अन्याय के खिलाफ किसी भी आंदोलन, धरना, प्रदर्शन में लोगों को एक मजबूत संबल मिलता था। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने लिखा कि सच कहने का उनमें गजब का साहस था। वे आजीवन सिद्धांत और ईमानदारी की राजनीति करते रहे। उनके निधन ने समाज में एक जनपक्षकार की रिक्तता पैदा कर दिया।

प्रयागराज और लखनऊ से पत्रकारिता में पदार्पण करने वाले वरिष्ठ पत्रकार निशीथ जोशी ने अतुल अनजान को याद करते हुए कहा कि ‘उनके न होने से उपजी शून्यता लंबे समय तक बनी रहेगी जिसकी भरपाई मुश्किल है। अतुल अनजान अपने अर्थपूर्ण लेखों, ओजस्वी भाषणों और विद्रोही तेवर के लिए हमारी स्मृतियों में बने रहेंगे। हाशिये की मुखर आवाज अतुल अनजान को अंतिम प्रणाम’।

कामरेड अतुल अनजान की हजरतगंत काफी हाउस की बैठकी बेहद चर्चित थी। उसमें लखनऊ के सिविल सोसायटी से जुड़े अनेक लोग शामिल होते थे। उनमें नेता, पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफेसर शामिल रहते थे।
विद्रोही कामरेड अतुल अनजान
हर बार एक नया विमर्श पैदा करते थे विद्रोही कामरेड अतुल अनजान

सिद्धार्थनगर स्थित समाजवादी अध्ययन केंद्र के संस्थापक मणेंद्र मिश्रा मशाल ने दिवंगत विद्रोही कामरेड को याद करते हुए लिखा कि उनसे परिचय 20 वर्ष पूर्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हुआ था। प्रो. बनवारी लाल शर्मा के संयोजन में आजादी बचाओ आंदोलन में सक्रिय रहते हुए हम लोगों ने उनके कई कार्यक्रम कराए जिनमें उन्हें करीब से सुनना हुआ था। उस समय सेज (स्पेशल इकनॉमिक जोन) के खिलाफ अतुल अनजान का किसानों के समर्थन में दिए गए वक्तव्य की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा थी। जनजातीय क्षेत्रों में मानवाधिकारों के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी।

वामपंथी राजनीति को पसंद न करने वाले लोग भी उनका भाषण सुनने दूर-दूर से आते थे। दिल्ली स्थित मावलंकर हाल, कांस्टीट्यूशन क्लब, तीन मूर्ति लाइब्रेरी में शहीदे आजम भगत सिंह, सामयिक मुद्दों पर कामरेड एबी वर्धन के साथ अतुल अनजान की उपस्थिति हर बार एक नया विमर्श पैदा कर देती थी।

अतुल अनजान आजीवन छात्र आंदोलन के जेपी मूवमेंट वाली पीढ़ी और नए छात्र/नौजवानों में एक समन्वयकारी भूमिका में रहते थे।
विद्रोही कामरेड अतुल अनजान

प्रेस कांफ्रेंस करके करवाई थी जेल में बंद छात्र नेताओं की रिहाई

वर्ष 2019 में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 12-13 जुलाई को आयोजित समाजवादी समागम में उन्होंने राजनीति में विचार और जनाधार दोनों को बचाने के लिए समाजवादियों से आह्वान किया था। लखनऊ विश्वविद्यालय के लोकप्रिय छात्रसंघ अध्यक्ष रहे अतुल अनजान आजीवन छात्र आंदोलन के जेपी मूवमेंट वाली पीढ़ी और नए छात्र/नौजवानों में एक समन्वयकारी भूमिका में रहते थे।

2018 में लखनऊ विश्वविद्यालय के आन्दोलनरत छात्रों के जेल जाने पर मीसा बंदी एवं लोकतंत्र रक्षक सेनानी, सत्तर के दशक में मेरठ कॉलेज की छात्र राजनीति से निकले पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र चौधरी की पहल पर प्रो. रमेश दीक्षित (लखनऊ विश्वविद्यालय) एवं लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व पदाधिकारियों का सफल संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कराने का श्रेय अतुल को ही रहा।

लखनऊ छात्रसंघ के इतिहास में यह अपने आप में अनूठी घटना थी जिसमें पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों में अतुल अनजान, सत्यदेव त्रिपाठी, अरविन्द सिंह गोप, अरविन्द कुमार सिंह, डॉ राजपाल कश्यप प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। उसका असर यह रहा कि जेल में बंद छात्रनेताओं की जल्द रिहाई हो गयी। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में लखनऊ विश्वविद्यालय में सरकारी धन का दुरुपयोग को लेकर प्रोटेस्ट करने वाले छात्र-छात्राओं की गिरफ्तारी और उत्पीड़न की निंदा की गई थी।

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