Resort Politics Jharkhand रांची: झारखंड की राजनीति इन दिनों बड़े रोमांटिक दौर से गुजर रही है। राज्यसभा चुनाव ने नेताओं के दिलों में अपने-अपने विधायकों के लिए ऐसा प्रेम जगा दिया है कि वर्षों से जनता को नसीब न हुई चिंता अचानक विधायकों पर बरसने लगी है। कोई उन्हें पांच सितारा होटल में ठहरा रहा है, कोई दूसरे होटल में बैठाकर निष्ठा का पाठ पढ़ा रहा है। लोकतंत्र का यह नया अध्याय बताता है कि चुनाव आते ही विधायक जनता के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि दुर्लभ प्रजाति के ऐसे जीव बन जाते हैं जिनकी सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम जरूरी हो जाते हैं।
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कहते हैं प्यार और राजनीति में सब जायज होता है। झारखंड में इन दिनों दोनों का संगम दिखाई दे रहा है। एक तरफ एनडीए अपने विधायकों को होटल में समेटकर बैठा है, दूसरी तरफ महागठबंधन भी कमरा नंबर 108 से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक रिश्तों की मजबूती का रिहर्सल कर रहा है। दोनों पक्षों को अपने विधायकों पर पूरा भरोसा है, लेकिन यह भरोसा इतना मजबूत है कि उसे होटल के कमरे, सुरक्षा घेरे और लगातार बैठकों के सहारे जिंदा रखना पड़ रहा है।
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बाहर से देखने पर लगता है कि सभी विधायक अपनी-अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। अंदर की कहानी यह है कि सभी को डर है कि कहीं किसी विधायक की अंतरात्मा अचानक जाग न जाए। भारतीय राजनीति में अंतरात्मा बड़ा रहस्यमयी प्राणी है। यह पांच साल तक गहरी नींद में सोती रहती है और राज्यसभा चुनाव, राष्ट्रपति चुनाव या सरकार गिराने-बचाने के समय अचानक अलार्म बजाकर उठ खड़ी होती है।
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एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के लिए चार अतिरिक्त वोटों की तलाश चल रही है। यह तलाश किसी खोई हुई वस्तु की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रेम की है जो सही समय पर पाला बदलकर इतिहास बना देता है। उधर कांग्रेस और झामुमो का दावा है कि उनके पास पर्याप्त संख्या है। लेकिन राजनीति में संख्या और संस्कार दोनों आखिरी क्षण तक स्थिर नहीं रहते। यहां अंकगणित का सबसे बड़ा दुश्मन महत्वाकांक्षा होती है।
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सबसे मजेदार दृश्य यह है कि जिन नेताओं को जनता की समस्याओं पर एक मंच पर बैठना मुश्किल लगता है, वे विधायकों को बचाने के लिए घंटों एक ही होटल में बैठ सकते हैं। महंगाई, बेरोजगारी, सड़क, बिजली, पानी जैसे मुद्दों पर बैठकें अक्सर टल जाती हैं, लेकिन राज्यसभा चुनाव आते ही नेताओं की कार्यक्षमता देखकर निजी कंपनियों के एचआर विभाग भी प्रेरणा ले सकते हैं।
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बीजेपी कह रही है कि विधायक अंतरात्मा की आवाज पर वोट देंगे। कांग्रेस कह रही है कि बीजेपी के पांच-छह विधायक संपर्क में हैं। यानी दोनों पक्षों को अपने विधायकों से ज्यादा भरोसा दूसरे पक्ष के विधायकों पर है। लोकतंत्र का इससे सुंदर उदाहरण और क्या होगा!
होटलों में बंद इस राजनीतिक प्रेम कथा को देखकर जनता भी मुस्कुरा रही होगी। पांच साल तक जो विधायक जनता के गांव-मोहल्लों में शायद ही दिखाई देते हों, वे चुनाव के दो दिन पहले नेताओं की निगरानी में ऐसे रखे जा रहे हैं जैसे आईपीएल की ट्रॉफी हो। कहीं कोई संपर्क न कर ले, कहीं कोई फोन न आ जाए, कहीं कोई पुराना दोस्त न मिल जाए, कहीं अंतरात्मा का नेटवर्क अचानक फुल सिग्नल न पकड़ ले।
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18 जून को जब सभी विधायक बस में बैठकर मतदान के लिए निकलेंगे तो दृश्य किसी स्कूल पिकनिक से कम नहीं होगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि वहां बच्चे उपस्थिति दर्ज कराने जाते हैं और यहां लोकतंत्र की निष्ठा की उपस्थिति दर्ज होगी। बस का हर यात्री करोड़ों की राजनीतिक उम्मीदें लेकर चलेगा और हर दल प्रार्थना करेगा कि कोई रास्ते में “विचार परिवर्तन” का शिकार न हो जाए।
राज्यसभा चुनाव का परिणाम चाहे जो हो, एक बात फिर साबित हो जाएगी कि भारतीय राजनीति में प्यार, विश्वास और वफादारी जितने महंगे शब्द हैं, उतनी ही महंगी उनकी सुरक्षा व्यवस्था भी है। इसलिए पुराने गीत की यह पंक्ति झारखंड की राजनीति पर बिल्कुल सटीक बैठती है—
“बाबू जी धीरे चलना, बड़े धोखे हैं इस प्यार में…”
बस यहां प्यार की जगह सत्ता, होटल की जगह लोकतंत्र और प्रेमी-प्रेमिका की जगह विधायक और नेता रख दीजिए। पूरा दृश्य अपने आप समझ में आ जाएगा।
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