Kharsawan Hera Panchami 2026: हेरा पंचमी पर क्यों तोड़ा जाता है भगवान जगन्नाथ के रथ का पहिया? जानिए पूरी परंपरा

Kharsawan Hera Panchami 2026: जगन्नाथ संस्कृति में रथयात्रा केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े प्रत्येक अनुष्ठान का अपना विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन्हीं में से एक प्रमुख अनुष्ठान हेरा पंचमी है, जो रथयात्रा के पांचवें दिन मनाया जाता है। इस अवसर पर सोमवार रात खरसावां, सरायकेला और हरिभंजा में परंपरागत श्रद्धा और विधि-विधान के साथ रथ भंगिनी की रस्म निभाई जाएगी।

महालक्ष्मी की शोभायात्रा पहुंचेगी गुंडिचा मंदिर

हेरा पंचमी के अवसर पर माता महालक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को श्रीमंदिर स्थित लक्ष्मी मंदिर से विशेष पालकी (विमान) में विराजमान कर गुंडिचा मंदिर तक भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। मंदिर पहुंचने के बाद वैदिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना और पारंपरिक संवाद संपन्न होगा। इसके बाद माता महालक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के नंदिघोष रथ के समीप पहुंचकर अपनी नाराजगी के प्रतीक स्वरूप रथ के अगले हिस्से की लकड़ी और पहिये को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त करेंगी। इसी धार्मिक परंपरा को रथ भंगिनी कहा जाता है।

महिलाओं की रहती है विशेष भागीदारी

इस अनुष्ठान की सबसे खास बात यह है कि इसमें भगवान जगन्नाथ के सेवकों की अपेक्षा माता लक्ष्मी के भक्तों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। बड़ी संख्या में महिलाएं लक्ष्मी मंदिर में विशेष पूजा के बाद पालकी यात्रा में शामिल होती हैं। सभी धार्मिक विधियां पूरी होने के बाद माता की प्रतिमा को पुनः सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर लाया जाता है।

पौराणिक कथा से जुड़ी है परंपरा

हेरा पंचमी भगवान जगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक कथा पर आधारित है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं और कई दिनों तक वापस नहीं लौटते। इससे देवी महालक्ष्मी नाराज होकर स्वयं गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और भगवान से अपनी नाराजगी व्यक्त करती हैं। भगवान जगन्नाथ शीघ्र लौटने का आश्वासन देते हैं, लेकिन देवी महालक्ष्मी प्रतीकात्मक रूप से नंदिघोष रथ का एक हिस्सा तोड़कर अपनी नाराजगी प्रकट करती हैं और फिर श्रीमंदिर लौट जाती हैं।

पुजारियों के माध्यम से होता है पारंपरिक संवाद

इस अनुष्ठान में भगवान जगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी के बीच संवाद सीधे नहीं होता, बल्कि दोनों पक्षों के पुजारियों द्वारा पारंपरिक ओड़िया भाषा में धार्मिक संवाद किया जाता है। इसके बाद देवी का मान-मनौव्वल कर उन्हें सम्मानपूर्वक वापस श्रीमंदिर ले जाया जाता है। यह परंपरा वर्षों से सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में श्रद्धापूर्वक निभाई जा रही है।

हेरा पंचमी के बाद शुरू होती है बाहुड़ा रथयात्रा की तैयारी

रथ भंगिनी अनुष्ठान के बाद भगवान जगन्नाथ की श्रीमंदिर वापसी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। हेरा पंचमी के तीसरे दिन रथ को श्रीमंदिर की दिशा में मोड़ने की प्रक्रिया दक्षिणामुख संस्कार के रूप में संपन्न होती है। इसके बाद निर्धारित तिथि पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा बाहुड़ा रथयात्रा के माध्यम से श्रीमंदिर लौटते हैं, जिसे जगन्नाथ परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन माना जाता है।

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