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Bihar Government: प्रेम की धुन से प्रतिरोध की आवाज तक, ‘मौसिकी’ में धड़कता हुआ समय

डॉ. अमित रंजन के काव्य संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ में प्रेम, पीड़ा, स्त्री अस्मिता, सामाजिक सरोकार और प्रतिरोध की संवेदना दिखाई देती है।


Bihar Government पटना: कविता जब सिर्फ शब्दों का विन्यास न रहकर जीवन की धड़कनों को सुनने का माध्यम बन जाती है, तब वह अपने समय का दस्तावेज भी बनती है। डॉ. अमित रंजन का काव्य संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय रचना है। संग्रह प्रेम, पीड़ा, स्मृति, सामाजिक बेचैनी, स्त्री अस्मिता, प्रतिरोध और बदलते ग्रामीण जीवन से लेकर डिजिटल दौर की चमक तक कई अनुभवों को एक साथ समेटता है।

बिहार विधान परिषद के सदस्य और जयप्रकाश विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष हिन्दी सह संकायाध्यक्ष प्रो. डॉ. वीरेन्द्र नारायण यादव के अनुसार, ‘मौसिकी’ को केवल प्रेम कविताओं या गजलों का संग्रह मानना इसके व्यापक रचनात्मक सरोकारों को सीमित करना होगा। उनके अनुसार, यह संग्रह जीवन के उन तमाम सुरों को पकड़ने का प्रयास है, जिनमें मनुष्य प्रेम करता है, टूटता है, सवाल करता है और जरूरत पड़ने पर अपने समय के विरुद्ध खड़ा भी होता है।

Bihar Government: प्रेम से जीवन की गहराई तक

संग्रह का शीर्षक ही इसकी संवेदना की पहली कुंजी है। ‘मौसिकी’ यानी संगीत, लेकिन यहां संगीत केवल सुर और लय का नहीं बल्कि जीवन के अनुभवों का है। ‘अहसासों का आसमान’ उस विस्तृत भावलोक की ओर संकेत करता है, जहां प्रेम, स्मृति, रिश्ते, अकेलापन, सामाजिक विसंगतियां और मनुष्य की जिजीविषा एक साथ मौजूद हैं।

डॉ. अमित रंजन के यहां प्रेम केवल रोमानी कल्पना नहीं है। वह समय के साथ बदलता है, रिश्तों में परिपक्व होता है और जीवन की जिम्मेदारियों के साथ नया अर्थ ग्रहण करता है।

“जो जिसकी आँखों में शरारत थी, महबूबा थी कभी,
थक के जो मुस्काती है अब, वही मेरी घरवाली है।”

इन पंक्तियों में प्रेम के शुरुआती आकर्षण से लेकर वैवाहिक जीवन की आत्मीयता तक की यात्रा दिखाई देती है। इसी तरह “इश्क जहां रहता है, दिल बूढ़ा नहीं होता” जैसी पंक्ति प्रेम को उम्र की सीमाओं से मुक्त कर जीवन की आंतरिक ऊर्जा में बदल देती है।

Bihar Government:सत्ता, स्त्री अस्मिता और प्रतिरोध की आवाज

‘मौसिकी’ का कवि केवल प्रेम में रमा हुआ कवि नहीं है। उसके आसपास का समाज भी उसे लगातार बेचैन करता है। सत्ता, पद और प्रतिष्ठा की क्षणभंगुरता पर उसकी पैनी नजर है।

“ये बुलंदी तो महज पल भर का इक तमाशा है,
तख्त का सारा गुरूर आखिर मिटा जाता है।”

यह प्रतिरोध किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं आता, बल्कि जीवन और इतिहास की समझ से पैदा होता है। कवि सत्ता के वैभव के सामने मनुष्य की नश्वरता को रखता है और इस तरह कविता को समय की आलोचनात्मक दृष्टि देता है।

संग्रह की ‘स्त्री-देह की जिरह में खड़ी इंसानियत’ जैसी कविता इस दृष्टि को और व्यापक बनाती है। इसमें स्त्री विमर्श केवल बहस की भाषा नहीं रह जाता, बल्कि न्याय और मनुष्यता का प्रश्न बन जाता है।

“कि न्याय की दृष्टि
मेरा चरित्र नहीं,
मेरे घाव देखे।”

इन पंक्तियों में स्त्री सहानुभूति की पात्र मात्र नहीं, बल्कि न्याय की स्वतंत्र अधिकारी मनुष्य के रूप में सामने आती है। यही मानवीय आग्रह कविता को स्त्री विमर्श से आगे ले जाकर इंसानियत की बहस में बदल देता है।


Key Highlights

  • डॉ. अमित रंजन के काव्य संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ में प्रेम से लेकर प्रतिरोध तक की संवेदना।

  • प्रो. डॉ. वीरेन्द्र नारायण यादव ने संग्रह के व्यापक सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया।

  • संग्रह में स्त्री अस्मिता और न्याय के सवाल को मानवीय दृष्टि से उठाया गया है।

  • डिजिटल दौर और बदलते ग्रामीण जीवन के बीच संघर्ष को कविताओं में प्रभावी ढंग से उकेरा गया है।

  • हिन्दी, उर्दू और लोकभाषा के मेल से संग्रह की भाषा को अलग पहचान मिली है।


Bihar Government:बदलते गांव और डिजिटल दौर की तस्वीर

‘मौसिकी’ की एक खास विशेषता इसकी भाषिक विविधता है। हिन्दी की सहजता, उर्दू के गजल मुहावरे और लोकभाषा की आत्मीयता एक दूसरे से संवाद करते दिखाई देते हैं। पारंपरिक काव्य संस्कारों के बीच आधुनिक जीवन की शब्दावली का प्रवेश संग्रह को आज के पाठक के करीब लाता है।

‘हेडलाइट्स की रोशनी में’ आधुनिक जीवन के उस विरोधाभास को सामने लाती है, जिसमें बाहर रोशनी बढ़ती जाती है लेकिन भीतर का अंधेरा अपनी जगह बना रहता है। वहीं ‘निर्दोष प्रेम के खेत में आधुनिकता की आंधी’ बदलते गांव और डिजिटल सभ्यता के टकराव को सहज बिंब के जरिए व्यक्त करती है।

“मोबाइल की रोशनी
धीरे धीरे
दीपक की लौ निगल रही है।”

यह केवल मोबाइल और दीपक के बीच का विरोध नहीं है। इसके पीछे बदलती सांस्कृतिक स्मृति, जीवन शैली और संवेदना की पूरी कहानी छिपी है।

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कुछ गजलों में बह्र और शिल्प की तकनीकी कसावट की और गुंजाइश दिखाई देती है। हालांकि किसी आरंभिक काव्य यात्रा का मूल्यांकन केवल तकनीकी मानकों पर करना उचित नहीं होगा। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कवि के पास कहने के लिए अपना अनुभव और उसे अभिव्यक्त करने की बेचैनी है। शिल्प समय के साथ निखर सकता है, लेकिन गहरी संवेदना अर्जित करना आसान नहीं होता।

दरअसल, ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ की सबसे बड़ी ताकत उसका मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है। यहां प्रेम है तो उसमें जीवन की गर्माहट है, पीड़ा है तो उसमें आत्मीयता है, स्त्री विमर्श है तो उसमें न्याय की मांग है, सामाजिक सरोकार है तो उसमें प्रतिरोध की चेतना है और आधुनिकता है तो उसके साथ अपनी मिट्टी और स्मृति को बचाए रखने की चिंता भी है।

कुल मिलाकर, ‘मौसिकी’ प्रेम की कोमल धुन से शुरू होकर प्रतिरोध की आवाज तक पहुंचने वाला ऐसा काव्य संसार है, जिसमें जीवन के अनेक रंग एक साथ सुनाई देते हैं। यह संग्रह पाठक को केवल कविता का रस नहीं देता, बल्कि उसे अपने रिश्तों, समाज, स्मृतियों और समय को नए सिरे से देखने के लिए प्रेरित करता है। यही किसी रचना की बड़ी उपलब्धि है कि वह पढ़े जाने के बाद भी भीतर कहीं बजती रहे, ठीक किसी मौसिकी की तरह।

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