A Symbol of Freedom : गया में आज भी मौजूद है 200 वर्ष पुरानी कुटिया जहां

A Symbol of Freedom

गया: A Symbol of Freedom – बिहार के गया में 200 साल पुरानी आजादी की लड़ाई वाली कुटिया है। यह कुटिया 1857 से लेकर 1942 और देश के आजाद होने तक चले स्वतंत्रता की लड़ाई में एक केंद्र बिंदु के रूप में रही थी। यहां आजादी के दीवाने जुटा करते थे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रणनीतियां बनती थी। कभी स्टेशन तो कभी अंग्रेजी फौज पर हमले की रणनीति यहां से तैयार होती थी। A Symbol of Freedom A Symbol of Freedom

देश की आजादी की लड़ाई में यह कुटिया महत्वपूर्ण भूमिका में रही। यही वजह है कि आजादी के बाद भी आज भी यह धरोहर के रूप में मौजूद है। यहां लोग आते हैं और इस कुटिया को नमन कर देश के स्वतंत्रता सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि देते हैं। गौरतलब हो, कि 1857 में चले अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में गया के वजीरगंज के 33 लोगों ने अपनी शहादत दी थी। यह कुटिया गया के वजीरगंज प्रखंड के बिशनपुर गांव में है। यह गांव पहाड़ी की गोद में बसा हुआ है।

इस कुटिया में कई बार अंग्रेजों ने मारा था छापा
गया के वजीरगंज के बिशनपुर में 200 साल पुरानी यह कुटिया आज भी मौजूद है। इस कुटिया में स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें लगी है। इस कुटिया को एक धरोहर के रूप में रखा गया है। आज इस कुटिया की देखरेख शंभू सिंह करते हैं, जिनके पिता शीतल सिंह भी एक स्वतंत्रता सेनानी थे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में जेल भी गए थे। इसके अलावा इस कुटिया में पहुंचने वाले दर्जनों स्वतंत्रता सेनानी जेल गए थे।

बिशुनपुर वजीरगंज प्रखंड में है, वजीरगंज का क्षेत्र रहा है। वजीरगंज इलाके के 23 आजादी के दीवानों ने 1857 की क्रांति के दौरान अपनी शहादत दी थी। आजादी के दीवाने भी इस कुटिया में आया करते थे। कुटिया से देश की आजादी की गतिविधियां की सूचना मिलने के बाद कई दफा अंग्रेजी हुकूमत ने यहां छापेमारी की। दर्जनों आजादी के दीवानों की गिरफ्तारियां भी इस कुटिया से होती रही।

अंग्रेज के आते ही पहाड़ों पर चढ़ जाते थे
बिशनपुर गांव आजादी की लड़ाई का केंद्र बिंदु रहा है। जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंका गया था, तो स्वतंत्रता सेनानियों के लिए बिशनपुर गांव उपयुक्त था। यह गांव पहाड़ियों से घिरा था। अंग्रेजों के खिलाफ चलने वाली लड़ाई में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह इसलिए सुरक्षित था, क्योंकि अंग्रेजों के आते ही स्वतंत्रता सेनानी पहाड़ियों पर चढ़ जाया करते थे। अंग्रेजी हुकूमत हाथ मलते रह जाती थी. यही कुटिया में स्वतंत्रता सेनानी जुटा करते थे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रणनीतियां तैयार होती थी। बिशनपुर इस कदर स्वतंत्रता सेनानियों के लिए सुरक्षित था, कि यहां मगध भर से आजादी के दीवानों का जुटान होता था।

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खुशियाल सिंह के नेतृत्व में लड़ी गई थी लड़ाई, 33 हुए थे शहीद
गौरतलब हो, की वजीरगंज के खुशियाल सिंह देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। इनकी देखरेख में अंग्रेजों के खिलाफ बड़ी लड़ाई चली थी। अंग्रेजों के खिलाफ चली बड़ी लड़ाई में खुशियाल सिंह समेत 33 क्रांतिकारी शहीद हो गए थे। अंग्रेज़ी हुकूमत ने कई को पेड़ में बांधकर फांसी दी थी। अंग्रेजी हुकूमत की अत्याचार के खिलाफ आजादी के दीवानों को एकत्रित करने में यह कुटिया हमेशा केंद्र बिंदु के रूप में रही। बात 1857 की हो, या 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो की लड़ाई की, इस कुटिया में स्वतंत्रता सेनानियों का जूटान होता रहा, जो देश के आजाद होने तक चला।

स्वतंत्रता सेनानी शीतल सिंह और उनके पूर्वज 1857 से सक्रिय रहे
स्वतंत्रता सेनानी शीतल सिंह और उनके पूर्वज 1857 से सक्रिय रहे। आजादी की लड़ाई में शीतल सिंह ने 1942 की लड़ाई अंग्रेजों भारत छोड़ो में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जेल गए। अन्य दर्जनों स्वतंत्रता सेनानियों को भी अंग्रेजी हुकूमत ने जेल भेजा था। हालांकि आजादी के दीवानों का परवान कभी नहीं थमा और देश को आजाद करवाने तक इस कुटिया से लड़ाई अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चलती रही।

200 साल पुरानी कुटिया को संजो रखा है, यह सच्ची श्रद्धांजली
फिलहाल में स्वतंत्रता सेनानी शीतल सिंह के पुत्र शंभू सिंह ने इस कुटिया को संजो कर रखा है। वह बताते हैं, कि उनके चाचा दादा अन्य पूर्वज 1857 से ही आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे। तब भी यह कुटिया थी और उनके पिता शीतल सिंह 1942 की लड़ाई में बढ़ चढ़कर भाग लिया, तब भी कुटिया थी और देश के आजाद होने के साथ दशक बाद भी यह कुटिया है। यह कुटिया स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान का प्रतीक है।

इस कुटिया में ही अब स्वतंत्रता सेनानी क्लब चलाया जा रहा है और इस क्लब के माध्यम से बच्चों को लाइब्रेरी और संगीत की शिक्षा दी जा रही है। हालांकि जगह का अभाव के कारण फिलहाल में यह शिक्षा बाधित है।

वजीरगंज प्रखंड मुख्यालय में है शहीद खुशियाल सिंह की प्रतिमा
वही, 1857 की आजादी की लड़ाई में बड़ी भागीदारी निभाते हुए खुशियाल सिंह शहीद हो गए थे। खुशियाल सिंह समेत 33 स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। वजीरगंज प्रखंड के 33 लोगों ने शहादत दी थी। आज भी इन 33 शहीदों के नाम वजीरगंज प्रखंड कार्यालय परिसर में उत्कीर्ण है। वहीं, शहीद खुशियाल सिंह की प्रतिमा भी है।

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गया से आशीष कुमार की रिपोर्ट

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