मतदान केंद्रों के वीडियो शेयर करना गोपनीयता पर खतरा, चुनाव आयोग ने कहा…

मतदान केंद्रों की वेबकास्टिंग वीडियो/सीसीटीवी फुटेज साझा करने की मांग: मतदाता की गोपनीयता और गोपनीय मतदान से जुड़ी चिंताएं

नई दिल्ली: हाल के दिनों में कुछ लोग मतदान के दिन मतदान केंद्रों पर हुई वेबकास्टिंग या सीसीटीवी फुटेज को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं। यह मांग देखने में तो बहुत तार्किक और लोकतंत्र के हित में लगती है, लेकिन वास्तव में इसका उद्देश्य ठीक इसके उलट है। यह मांग मतदाताओं की गोपनीयता और सुरक्षा के खिलाफ है और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 तथा भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के विपरीत है।

इस प्रकार की फुटेज साझा करने से यह आसानी से पहचाना जा सकता है कि किस मतदाता ने मतदान किया और किसने नहीं। इससे ऐसे मतदाताओं को, जिन्होंने वोट डाला या नहीं डाला, असामाजिक तत्वों द्वारा दबाव, भेदभाव या धमकी का शिकार बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी राजनीतिक दल को किसी बूथ में कम वोट मिलते हैं, तो वे वीडियो देखकर यह जान सकते हैं कि किसने वोट दिया और किसने नहीं, और फिर ऐसे मतदाताओं को परेशान किया जा सकता है। इसलिए ऐसे समूहों या व्यक्तियों द्वारा की जा रही मांग के पीछे की असल मंशा को समझना और उजागर करना जरूरी है।

चुनाव आयोग मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज को केवल 45 दिनों तक ही अपने पास रखता है, और वह भी केवल आंतरिक प्रबंधन के लिए। यह कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। उल्लेखनीय है कि चुनाव का परिणाम घोषित होने के 45 दिन के भीतर ही चुनाव याचिका दाखिल करने की अधिकतम अवधि है। इस अवधि के बाद अगर कोई याचिका दायर नहीं होती, तो फुटेज को रखना किसी गलत उद्देश्य से इस्तेमाल किए जाने का खतरा बन जाता है। यदि 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दाखिल की जाती है, तो फुटेज नष्ट नहीं की जाती और सक्षम न्यायालय द्वारा मांगे जाने पर उसे उपलब्ध कराया जाता है।

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चुनाव आयोग के लिए मतदाताओं के हितों की रक्षा करना और उनकी गोपनीयता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। कुछ राजनीतिक दल या हित समूह भले ही आयोग पर दबाव डालें, लेकिन आयोग किसी भी परिस्थिति में कानूनी प्रक्रिया को छोड़ने या मतदाताओं की सुरक्षा के साथ समझौता करने को तैयार नहीं है। मतदाता की गोपनीयता और मतदान की गोपनीयता आयोग के लिए “सर्वोच्च प्राथमिकता” है, जिसे न तो पहले कभी नज़रअंदाज़ किया गया है और न ही भविष्य में किया जाएगा।

नीचे दिए गए बिंदुओं में कुछ प्रासंगिक मुद्दों को उल्लेखित किया गया है:

A. मतदान दिवस की वीडियो फुटेज साझा करने से उन मतदाताओं की गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है जिन्होंने मतदान नहीं करने का निर्णय लिया है: किसी भी चुनाव में, कुछ मतदाता मतदान नहीं करने का निर्णय ले सकते हैं। मतदान दिवस की वीडियो फुटेज साझा  रने से ऐसे मतदाताओं की पहचान की जा सकती है। इससे यह भी पता लगाया जा सकता है कि किसने मतदान किया और किसने नहीं, जिससे मतदाताओं की प्रोफाइलिंग हो सकती है और उनके साथ भेदभाव, सेवाओं से वंचित करने, डराने-धमकाने या प्रलोभन देने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

B. पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ, (2013) 10 SCC 1 इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि मतदान का अधिकार, मतदान न करने के अधिकार को भी सम्मिलित करता है और यह गोपनीयता का अधिकार उन व्यक्तियों को भी प्राप्त है जिन्होंने मतदान न करने का निर्णय लिया है।

C. वीडियो रिकॉर्डिंग देना फॉर्म 17A देने के समान है: मतदान दिवस की वीडियो रिकॉर्डिंग में यह दर्ज होता है कि मतदाता किस क्रम में मतदान केंद्र में प्रवेश कर रहे हैं और उनकी तस्वीर/पहचान क्या है। यह केंद्रीय निर्वाचन नियमावली, 1961 के नियम 49L के अंतर्गत फॉर्म 17A (मतदाता रजिस्टर) के लाइव संस्करण के समान है, जिसमें मतदाता के प्रवेश क्रम, निर्वाचक नामावली में क्रम संख्या, प्रस्तुत किए गए पहचान पत्र का विवरण तथा अंगूठे का निशान/हस्ताक्षर दर्ज होता है।

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इसलिए, वीडियो रिकॉर्डिंग और फॉर्म 17A दोनों में ऐसी जानकारी होती है जो मतदान की गोपनीयता को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि किसने मतदान किया और किसने नहीं, जैसा कि फॉर्म 17A से पता चलता है। फॉर्म 17A केवल सक्षम न्यायालय के आदेश पर ही दिया जा सकता है (नियम 93(1), निर्वाचन संचालन नियमावली, 1961)। अतः, वीडियो फुटेज भी केवल सक्षम न्यायालय के आदेश पर ही प्रदान की जा सकती है, क्योंकि जो बात कानून के माध्यम से नहीं दी जा सकती, उसे वीडियो फुटेज के माध्यम से भी नहीं दिया जा सकता।

D. मतदान की गोपनीयता का उल्लंघन जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 128 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है: जो कोई भी इस धारा के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, उसे तीन महीने तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है। अतः चुनाव आयोग कानूनी रूप से बाध्य है और मतदाताओं की गोपनीयता और मतदान की गोपनीयता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। अतः, मतदान केंद्र की वीडियो फुटेज किसी व्यक्ति, उम्मीदवार, गैर-सरकारी संस्था (NGO) या किसी तीसरे पक्ष को मतदाता की स्पष्ट सहमति के बिना नहीं दी जा सकती।

वेबकास्टिंग मूल रूप से चुनाव आयोग द्वारा मतदान दिवस की गतिविधियों की निगरानी के लिए एक आंतरिक प्रबंधन उपकरण के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। हालाँकि, चुनाव याचिका के तहत किसी चुनाव को चुनौती देने के मामले में यदि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित किया जाता है, तो आयोग संबंधित न्यायालय को यह फुटेज प्रदान करने को तैयार रहता है, क्योंकि न्यायालय भी किसी व्यक्ति की गोपनीयता का संरक्षक होता है।

https://www.youtube.com/@22scopestate/videos

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