रांची: झारखंड की राजनीति में बड़कागांव विधानसभा सीट इस बार बड़े प्रयोग का गवाह बन रही है। भाजपा और आजसू, जो 2019 के विधानसभा चुनाव में अलग-अलग चुनावी मैदान में थे,, अब साथ आ गए हैं। लेकिन इस गठबंधन की दिलचस्प बात यह है कि भाजपा की टिकट पर आजसू के नेता चुनाव लड़ रहे हैं। कहने को तो यह भाजपा का प्रत्याशी है, लेकिन असल में यह सुदेश महतो का पारिवारिक प्रतिनिधि है। जनता कह रही है, “साहब, यह तो ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ का नया वर्जन है!”
2019 में कांग्रेस की अंबा प्रसाद को भाजपा-आजसू की लड़ाई का फायदा मिला था। इस बार दोनों एक साथ हैं, तो क्या अंबा की नैया डूबेगी? कुर्मी वोट तो पहले ही रोशन लाल चौधरी की झोली में दिख रहे हैं। लेकिन मुस्लिम, आदिवासी और दलित वोटों का मेला किस तरफ जाएगा, यह देखना होगा।
बड़कागांव के जातीय समीकरण ऐसे हैं कि हर प्रत्याशी का गणित हवा में तैरता है। यहां वोटों का जोड़-तोड़ किसी बॉलीवुड की सस्पेंस फिल्म से कम नहीं। जनता कहती है, “भाई साहब, यहां के वोटर तो ऐसे हैं जैसे परीक्षा में आखिरी रात की पढ़ाई, कभी भी पलट सकते हैं!”
वोटर केवल जाति और पार्टी से प्रभावित नहीं होते। बड़कागांव के लोग विस्थापन और बेरोजगारी से परेशान हैं। एनटीपीसी प्रोजेक्ट ने जमीन ली, रोजगार नहीं दिया। स्थानीय युवा कहते हैं, “हमारा हक लेकर बाहरी लोग मौज कर रहे हैं।” लेकिन यह मुद्दा सिर्फ चुनाव के समय ही नेताओं को याद आता है।
इस बार का गठबंधन एक तरफ रोशन लाल चौधरी को कुर्मी वोट दिला रहा है, तो दूसरी तरफ भाजपा और आजसू का एकजुट चेहरा दिखा रहा है। जनता का कहना है, “ये कैसा गठबंधन है भाई, जहां झगड़ा भी अपना और साथ भी अपना। ये तो वैसा ही है, जैसे एक ही स्टूल पर दो नेता, कौन गिरेगा, ये वोटर तय करेगा!” अंबा प्रसाद की मेहनत भी कम नहीं। उन्होंने महिला और युवा वोटरों को साधने की पूरी कोशिश की है। लेकिन जनता की याददाश्त तो गोल्डफिश जैसी होती है—पिछले काम भूलकर नए वादों पर फिदा हो जाती है। तो बड़कागांव की राजनीति इस बार एक हाई-वोल्टेज ड्रामा बनने जा रही है। जनता के मन में सवाल है—क्या भाजपा-आजसू का यह ‘साथ-साथ’ अंबा की जीत की राह रोक पाएगा? या फिर जनता फिर से वही पुरानी धुन बजाएगी, “अंबा तेरा खेल निराला”?


















