अशोक पागल के तीन हास्य नाटकों का हुआ मंचन, हंस-हंसकर लोटपोट हुए दर्शक

अशोक पागल के तीन हास्य नाटकों का हुआ मंचन, हंस-हंसकर लोटपोट हुए दर्शक

नाटक ‘जिंदा भूत’, ‘फसाद की जड़’ और ‘बहाने’ का एक साथ मंचन

रांची : कडरू स्थित ‘झारखंड फिल्म एंड थिएटर एकेडमी’ के स्टूडियो थिएटर में ‘लेखक एक कहानी 3’

नाम से एक थियेटर फेस्टिवल का आयोजन किया गया.

जिसके तहत वरिष्ठ रंगकर्मी दिवंगत अशोक पागल के तीन हास्य नाटकों को मंच पर उतारा गया.

जिसमें ‘फसाद की जड़’, ‘जिंदा भूत’ और ‘बहाने’ इन तीनों ही नाटकों का निर्देशन किया.

राजीव सिन्हा ने जबकि नाटकों में अभिनय करने वाले कलाकारों में शामिल थे

निशा गुप्ता, मनु कुमार, सामर्थ झा, अंकिता कुमारी, मुस्कान मेधा, अभिषेक राय,

मानव जालान, निलेश कुमार, राजा कुमार, अभिनव आरोही, अब्दुल तौफीक,

अनुराग ओलिवर तिर्की और निकेश तिग्गा.

हास्य नाटकों का मंचन- फसाद की जड़

अर्जुन सक्सेना और दिव्या सक्सेना एक सुखद दाम्पत्य, जिनके बीच कभी कोई फसाद नहीं हुआ,

यानि कि कभी कोई झगड़ा ही नहीं हुआ,

बहरहाल पड़ोस में एक बिहारी फैमिली को आए हुए कुछ ही दिन हुए हैं, लेकिन अक्सर उनके बीच झगड़े की जोर जोर से आवाज आती है. अर्जुन और दिव्या के बीच की शांति उन्हे नहीं भाती, तब दोनों पति पत्नी के बीच की शांति को भंग करने की आपस में तन जाती है, और आखिरकार कामयाब भी होते हैं. और बन जाते हैं अर्जुन और दिव्या के बीच फसाद की जड़.

‘जिंदा भूत’ नाटक का मंचन

निलेश अपनी पत्नि सुंदरी को एक नया घर दिखाने लाता है जहां अब वो रहने वाले हैं निलेश घर की तारीफ करते नहीं थकता क्योंकि घर का किराया मात्र 500 रुपए है. एक कमरे से जब दुर्गंध आती है माचिस और कैंडल लाने निलेश पड़ोस में चला जाता है जहां उसे डॉक्टर मृत्युंजय सत्य भूषण और एक कभी से मुलाकात होती है. जो किसी भूत से कम नहीं होते दरअसल तीनों ही माचिस और कैंडल के बजाय निलेश अपनी सर्विस से हाल बेहाल कर देते हैं और अंत में निलेश यह तय करता है तीन जिंदा भूतों के बीच उन्हें नहीं रहना.

हास्य नाटकों का मंचन – बहाने

पंडित जी और उनका नौकर भोला साथ रहते हैं एक दिन जब पंडित जी सुबह सोकर उठते हैं, तो पाते हैं कि आज नल में पानी नहीं आने वाला है. ऐसी स्थिति में पंडित जी को बिना नहाए ही पूजा कराने जाना पड़ता है. इस बात के लिए पंडित जी भोला को मना करते हैं कि वह किसी को भी ना बताएं अन्यथा लोगों का पूजा पाठ से विश्वास उठ जाएगा. पंडित जी के जाते ही गांव का युवक मुरली भोला से कंबल मांगने आता है.

क्योंकि पंडित जी ने किसी को भी कोई भी सामान देने से मना किया है तो भोला मुरली को कंबल देने से मना कर देता है, लेकिन काफी आग्रह के बाद जब कंबल उसे दे देता है तो पंडित जी के घर वापस आने के बाद उसे खूब डांट पड़ती है, पंडित जी कहते हैं कि अबकी से कोई अगर रजाई मांगने आए तो उसे कहना रजाई फटी हुई है और उसमें से रुई निकल रही है.

कुछ ही देर बाद कुंदन पंडित जी के घर आता है लालटेन मांगने, अब बुद्धू भोला उसे रजाई वाली बहाने लालटेन के लिए सुना जाता है, बाद में कुंदन उसे जब पंडित जी की सच्चाई बताने के लिए ब्लैकमेल करता है तो भोला को लालटेन देना पड़ जाता है अंत में पंडित जी उससे खूब नाराज होते हैं जिसकी वजह से जब एक युवक पंडित जी को बुलाने आता है तो बोला तंग आकर घर छोड़कर चला जाता है.

नाटक के मंचन के दौरान रांची रंगमंच से रंगकर्मी सूरज खन्ना, विनोद जायसवाल और कुमकुम गौड भी मौजूद थे.

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