जनार्दन सिंह की रिपोर्ट
डिजीटल डेस्क : उपराष्ट्रपति ने कहा – सनातन सीख देता है हमें दृढ़ रहने – एक रहने की…। काशी यानी वाराणसी में शुक्रवार शाम को देव दीपावली समारोह एवं नमो घाट के शुभारंभ के लिए पहुंचे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने संबोधन में सनातन को लेकर कई बातें कहीं।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ बोले – सनातन हमको एक सीख देता है –‘दृढ़ रहने की, एक रहने की, मजबूत रहने की। …और आज के समय में चुनौतियों को देखते हुए यह अत्यंत आवश्यक है कि सनातन की मूल भावना में हमारा विश्वास हो’।
उपराष्ट्रपति बोले – भारत सनातन की भूमि, काशी इसका केंद्र…
सनातन पर बोलते हुए उपराष्ट्रपति यहीं नहीं रुके। अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आगे कहा कि – ‘…हमारी सांस्कृतिक जड़ें बहुत जरूरी है। ये हमें जीवंत रखती हैं। भारत सनातन की भूमि है, काशी इसका केंद्र है।
…सनातन में विश्व शांति का संदेश है। सनातन सभी को समाहित करता है। सनातन विभाजनकारी ताकतों का विरोध करता है।
…सनातन राष्ट्रधर्म और भारतीयता का प्रतिबिंब है। हमें सदैव याद रखना चाहिए कि हम भारतीय हैं। भारत में अटूट विश्वास है, राष्ट्र-धर्म सर्वोपरि है। किसी भी परिस्थिति में राष्ट्र-हित को नहीं छोड़ सकते’।

झिंझोड़ते हुए बोले उपराष्ट्रपति – सनातन भारतीय आत्मा है, इसको चुनौती?…सहनीय नहीं…
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इसी क्रम में समारोह में मौजूद लोगों और देशवासियों को झिंझोड़ने की मुद्रा में सनातन पर अपनी बात रखना जारी रखा।
उपराष्ट्रपति ने आगे कहा कि – ‘…हमें सदैव बोध होना चाहिए कि सनातन भारतीय आत्मा है। …सनातन को चुनौती ?…सनातन को नहीं मानना ? – हमारे लिए सहनीय नहीं हो सकता।
…हमें सजग रहना है। सनातन के संरक्षण और सृजन का संकल्प सभी भारतीयों को लेना चाहिए।
…काशी से श्रेष्ठ स्थान इसके लिए कोई और नहीं हो सकता…इसलिए पुरजोर प्रार्थना इस संकल्प के लिए सभी देशवासियों से करता हूं।
…नजर फैला लो दुनिया में कहीं भी, भारतीय संस्कृति दुनिया में अनूठी है। काशी इसकी मिसाल है’।

उपराष्ट्रपति बोले – सांस्कृतिक विरासत संजोने का दायित्व किसी एक व्यक्ति या सरकार का नहीं…
यही नहीं, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने देश के नागरिकों को उनके दायित्वों का भी बोध कराया। अपने संबोधन में उन्होंने सनातन और भारतीय संस्कृति व विचारधारा का खूब उल्लेख किया।
उपराष्ट्रपति ने आगे कहा – ‘…सदैव याद रखें – सांस्कृतिक जड़ें हमारे वर्तमान और भविष्य के निर्माण का आधार हैं। और सांस्कृतिक विरासत संजोने का दायित्व किसी एक व्यक्ति या सरकार का नहीं है। ये हममें से हरेक व्यक्ति का है।
…दो बातों की ओर आपको ले जाना चाहता हूं – स्वदेशी और सामाजिक समरसता।
…स्वदेशी का भाव अपने में जागरण करें। स्वदेशी हमारी आजादी का विशेष अंग रहा है। …स्वदेशी जागरण से आत्मनिर्भरता, विदेशी मुद्रा बचाव और स्वदेशी रोजगार का फैलाव होता है।
…सामाजिक समरसता हमारे सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग रहा है। इस देश में कभी भी किसी ने आक्रमण की नहीं सोची। हमारी संस्कृति हमें प्रेरणा देती है – सभी को साथ लेकर चलें।
…भारत सामाजिक समरसता की नींव है। दुनिया को बड़ा संदेश देती है। मानवता का सबसे बड़ा धर्म सामाजिक समरसता है’।


















