प्रयागराज : महाकुंभ 2025 में सुर्खियों में छाए नागा साधुओं के बनने में लगते हैं 6 से 12 साल। महाकुंभ 2025 के शुभारंभ के पहले दिन से ही देश और दुुनिया में नागा साधु सुर्खियों में है। उनके आचरण, पुण्य स्नान से लेकर विचरण तक के अंदाज पर जमकर चर्चा हो रही है और उन संबंधी तमाम जानकारियां भी जुटाई जा रही हैं।
महाकुंभ मेला क्षेत्र में पधारे 13 अखाड़ों में शामिल नागा साधु आस्था और श्रद्धा के पर्व में जितने पूजनीय भाव देखे जा रहे हैं या जितना आदर-सम्मान उन्हें आम श्रद्धालु एवं तीर्थयात्री दे रहा है, वह यूं ही नहीं है। महज महाकुंभ में चंद दिनों की तपस्या या संस्कार कीऔपचारिकता मात्र से ही कोई नागा साधु नहीं बन जाता।
अखाड़ों से मिले ब्योरों से पता चला है कि एक नागा साधु को संपूर्ण प्रशिक्षण अवधि पूरा कर सही मायनों में नागा साधु बनने में तकरीबन 2190 दिन से लेकर 4380 दिनों तक का समय लग जाता है जो कि करीब 6 वर्ष से 12 साल की समयावधि है।
नागा साधु बनने के लिए इन अनिवार्य प्रक्रियाओं से गुजरना जरूरी…
नागा साधु बनने के लिए पहले व्यक्ति को बह्मचर्य की दीक्षा दी जाती है और दीक्षा के बाद उसे 3 साल तक गुरुओं की सेवा करने होती है। उसे धर्म, दर्शन और कर्मकांड के बारे में बताया जाता है। वह पास करने के बाद महापुरुष बनने की दीक्षा दी जाती है। फिर वहीं से उसकी सबसे कड़ी ट्रेनिंग शुरू होती है यानी प्रशिक्षण में परीक्षण का दौर शुरू होता है।

इसके तहत सबसे पहले तो कुंभ में पहले प्रशिक्षु साधु का मुंडन करवाया जाता है और फिर नदी में 108 डुबकी लगवाई जाती है। डुबकी लगाने के बाद अखाड़े के 5 संन्यासियों को अपना गुरु बनाया जाता है। फिर अवधूत बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। अवधूत बनाने में साधु का जनेऊ संस्कार किया जाता है, 17 पिंडदान करवाया जाता है और उसे संन्यासी बनने की शपथ दिलाई जाती है।
उसके बाद दंडी संस्कार होता है और फिर पूरी रात ॐ नमः शिवाय का जाप करना पड़ता है। जाप के बाद सुबह ही व्यक्ति को अखाड़े में विजया हवन करवाया जाता है और फिर 10 डुबकियां गंगा में लगवाई जाती है। अखाड़े के ध्वज के साथ दंडी त्याग करवाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को बिजवान कहते हैं। उसके बाद अंतिम परीक्षा होती है दिगंबर और श्रीदिगम्बर की।

दिगम्बर नागा एक लंगोट धारण कर सकता है, लेकिन श्री दिगम्बर को बिना कपड़ों के रहना होता है। श्री दिगम्बर की इंद्री तोड़ दी जाती है और फिर नागा साधु बने शख्स को वन, हिमालय, आश्रम और पहाड़ों में कठिन योग-साधना करना होता है। उस दौरान कितनी भी ठंड हो, लेकिन प्रशिक्षु साधु कपड़े नहीं पहन सकते। उस कठिन प्रशिक्षण रूपी परीक्षण में तकरीबन 2190 दिन से लेकर 4380 दिनों तक का समय लग जाता है।

नागा साधुओं से भी कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है नागा साध्वियों की जिंदगी…
इसी क्रम में अहम जानकारी यह है कि महिला नागा साधु यानी नागा साध्वी की जिंदगी पुरुष नागा साधुओं से भी कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है। महाकुंभ में पधारे अखाड़ों के महंत बताते हैं कि कई महिला नागा साधुओं को महाकुंभ में देखा गया जो सिर्फ गंती पहने अमृत स्नान करने पहुंचीं थीं लेकिन सच्चाई यह भी है कि कई महिला नागा साधु गंती भी नहीं पहनतीं यानि वो पूरी तरह निर्वस्त्र रहती हैं और सामने नहीं आतीं।

वे हमेशा छुपकर रहती हैं और अपनी पूरी जिंदगी वो भगवान को समर्पित कर देती हैं। तप और साधना में ही लीन रहती हैं। उनका ठौर – ठिकाना कहां है, इस बारे में किसी को भी सटीक जानकारी नहीं है लेकिन माना जाता है कि वो पहाड़ों में और गुफाओं में ही अमूमन रहती हैं जहां वो शांति से अपना ध्यान लगा सकें। बता दें कि महिला नागा साधु जो वस्त्र धारण करती हैं उसे गंती कहा जाता है।
यह सिर्फ गेरुए रंग का ही होता है। इसी क्रम में खास बात यह कि नागा साध्वियों की अराधना और तपस्या देखने के साथ-साथ उनके गुरु उनके पूर्व जीवन के बारे में भी जानते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महिला नागा साधु बनकर ईश्वर को अपना जीवन समर्पित कर पाएगी या नहीं।

इसके साथ ही कई और नियम होते हैं। जैसे महिला नागा साधु हर वक्त सांसारिक गतिविधियों से दूर रहेंगी और केवल कुछ ही खास दिनों में वो सबके सामने आएंगी। उदाहरण के लिए कुंभ मेले के दौरान नागा साध्वियों को देखा जा सकता है। अहम बात यह कि किसी भी महिला को नागा साधु बनने के लिए बचपन से ही कड़ी परीक्षाएं देनी होती हैं।
6 साल की उम्र से ही उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है.। जब वो ऐसा कर पाने में समर्थ होती है तब उसे नागा साध्वी बनने की अनुमति मिलती है। इस अवधि में उसे कठोर तपस्या के साथ कई नियमों का पालन करना होता है जैसे गुफाओं में वास, तप, नदी में स्नान, खाने-पीने से जुड़े कठोर नियम आदि।

दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा देता है नागा साध्वी बनने, हाल के वर्षों में बढ़ी इन साध्वियों की तादाद
महाकुंभ में पधारे अखाड़ों से मिली जानकारी के मुताबिक, भारत में सिर्फ दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा ही महिला नागा साधुओं को साध्वी बनने की अनुमति प्रदान करता है। अन्य अखाड़ों में पुरुषों को ही लिया जाता है। शुरुआती दौर में महिलाओं के लिए कोई अलग से अखाड़ा नहीं था। जूना अखाड़े में ही माई बाड़ा नाम से उनके लिए अलग शिविर का आयोजन किया जाता था।

कुंभ में भी जूना अखाड़ा अपने बगल में माई बाड़ा शिविर का आयोजन करता था जिसमें महिला सन्यासी आती थीं। उसके बाद महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी और वर्ष 2013 में दशनामी संन्यासिनी का अखाड़ा बना। तब से महिलाएं नागा साध्वी भी इसी अखाड़े के जरिए बनती हैं।


















