बिहार म्यूजियम की दुकान देश की सबसे अधिक बिक्री करने वाली संग्रहालय दुकान बनी

पटना : राजधानी स्थित बिहार म्यूजियम की सोविनियर शॉप देश की सर्वाधिक बिक्री करने वाली दुकान बन गई है। बीते एक वर्ष में इस दुकान से विभिन्न तरह के सामानों की बिक्री से एक करोड़ 71 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। जबकि, वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान इसका कारोबार एक करोड़ 34 लाख रुपए था।

यह शॉप बिहार की समृद्ध कला और शिल्प का उदाहरण प्रस्तुत करती है

आपको बता दें कि यह शॉप बिहार की समृद्ध कला और शिल्प का उदाहरण प्रस्तुत करती है। यहां उपलब्ध उत्पादों में परंपरा और आधुनिकता देखने को मिलता है, जिसे पर्यटक पसंद कर रहे हैं। दुकान में दैनिक उपयोग की वस्तुओं जैसे की-रिंग, की-चेन, पेन और डायरी आकर्षक डिजाइनों में उपलब्ध हैं। इसके अलावा महिलाओं के लिए साड़ियां और सूट, युवाओं के लिए स्टाइलिश लैपटॉप बैग, मोदी कोट व घर की सजावट के लिए शो-पीस और वॉल हैंगिंग्स भी उपलब्ध हैं। इस शॉप की सबसे खास बात यह है कि यहां बिहार की पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। मधुबनी पेंटिंग और मिथिला पेंटिंग से सजे उत्पाद पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित कर रहे हैं। वहीं सिक्की कला से बने ईयररिंग्स और जूट बैग भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।

भागलपुरी सिल्क और खादी कॉटन से तैयार परिधान भी यहां उपलब्ध हैं

भागलपुरी सिल्क और खादी कॉटन से तैयार परिधान भी यहां उपलब्ध हैं। ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को देखते हुए यहां हाथ से बने बावन बूटी खादी कॉटन साड़ियां दर्शकों को काफी पसंद आ रहे हैं। नालंदा में हस्तनिर्मित इन साड़ियों की बुनाई पूरी तरह हैंडलूम तकनीक से होती है। इसके साथ ही यहां जेल में बंद कैदियों द्वारा निर्मित उत्पाद भी बिक्री के लिए रखे गए हैं। गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए कॉटन की कुर्तियां और महिलाओं के लिए खादी कॉटन की साड़ियां उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत सात सौ रुपए से लेकर सात हजार रुपए तक है।

इस दुकान से केवल आर्थिक कारोबार ही नहीं बल्कि स्थानीय कारीगरों को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनने का अवसर मिल रहा है – अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा

म्यूजियम के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने बताया कि इस दुकान से केवल आर्थिक कारोबार ही नहीं बल्कि स्थानीय कारीगरों को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनने का अवसर मिल रहा है। आने वाले समय में इस शॉप में और भी नए उत्पाद शामिल करने की योजना है, ताकि बिहार की कला और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और पहचान मिल सके।

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