Gumla Bamboo Farming Training, गुमला: जिले में बाँस की औद्योगिक खेती को बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि के उद्देश्य से जिला उद्यान कार्यालय की ओर से राष्ट्रीय बाँस मिशन योजना के तहत पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण में जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए 14 किसानों और एक क्षेत्रीय कार्यकर्ता ने हिस्सा लिया। प्रशिक्षण कार्यक्रम 15 सितंबर से 20 सितंबर 2026 तक आयोजित किया गया। इसमें किसानों को बाँस की उन्नत खेती, पौधरोपण की विधि, इसके उपयोग और भविष्य की व्यावसायिक संभावनाओं के बारे में जानकारी दी गई।
32 हेक्टेयर भूमि पर बाँस की खेती का लक्ष्य
राष्ट्रीय बाँस मिशन के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2026-27 में गुमला जिले में कुल 32 हेक्टेयर भूमि पर बाँस की औद्योगिक खेती कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसमें निजी भूमि पर 24 हेक्टेयर और सरकारी भूमि पर 8 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इस योजना के तहत किसानों को उन्नत नस्ल के बहुउपयोगी बाँस लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। विभाग का उद्देश्य बाँस की खेती को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अवसर तैयार करना है।
बाँस की खेती के महत्व और उपयोग की जानकारी
उद्यान निदेशालय द्वारा नामित रांची की छोटानागपुर क्राफ्ट डेवलपमेंट सोसाइटी के सहयोग से प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया गया। संस्था के प्रशिक्षकों कीर्तिमान नाथ, अंजीत उराऊं और सुकरा उराऊं ने किसानों को बाँस से संबंधित विभिन्न जानकारियां दीं। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को बाँस लगाने की तकनीक, इसके रखरखाव, विभिन्न उपयोगों और आय वृद्धि में इसकी भूमिका के बारे में समझाया गया। प्रतिभागियों को यह भी बताया गया कि आने वाले समय में वैश्विक बाजार में बाँस की मांग बढ़ने की संभावनाएं हैं।

लकड़ी और प्लास्टिक का विकल्प बन सकता है बाँस
प्रशिक्षण में बाँस को लकड़ी और फाइबर आधारित प्लास्टिक के विकल्प के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। बाँस घास की एक प्रजाति है, लेकिन इसके बहुउपयोगी गुणों के कारण इसे कई बार ‘हरित सोना’ कहा जाता है। बाँस को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है। ऐसे समय में जब दुनिया प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, बाँस हरियाली बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे सकता है। किसानों को बाँस की खेती के माध्यम से कार्बन क्रेडिट से संभावित आय के बारे में भी जानकारी दी गई। इससे बाँस की खेती को केवल कृषि गतिविधि ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और आर्थिक लाभ से जुड़ी पहल के रूप में भी देखा जा रहा है।
किसानों को हरसंभव सहयोग का भरोसा
गुमला की जिला उद्यान पदाधिकारी तमन्ना परवीन ने किसानों को बाँस की औद्योगिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि किसानों को विभाग की ओर से हरसंभव सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद सभी प्रतिभागी किसानों और कार्यालय की ओर से क्षेत्रीय कार्यकर्ता के रूप में नामित दीपक सिंह को प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। विभाग को उम्मीद है कि प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी का उपयोग कर किसान बाँस की खेती को आय वृद्धि के एक प्रभावी माध्यम के रूप में अपना सकेंगे।



















