Ranchi Desk : भारत में हर दिन कई नवजात शिशु लावारिस अवस्था में छोड़े जाने पर असुरक्षा और लापरवाही का शिकार हो जाते हैं। इन शिशुओं के जीवन और अस्मिता की रक्षा के उद्देश्य से पालोना अभियान, जो आश्रयणी फाउंडेशन द्वारा समर्थित है, नवजात सुरक्षा अधिनियम (Infant Protection Act – IPA) की माँग को लेकर निरंतर काम कर रहा है। इसी कड़ी में शुक्रवार रात अभियान की छठी वर्चुअल बैठक आयोजित हुई।
नवजात शिशु सुरक्षा अधिनियम 2024 की छठी बैठक संपन्न, परित्यक्त शिशुओं की रक्षा हेतु तय हुईं नई रणनीतियाँ
इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिए शुक्रवार रात राष्ट्रीय कोर कमेटी की छठी वर्चुअल बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में 12 सदस्यों ने भाग लिया जिसमें डॉक्टर कृपया शंकर चौबे (भोपाल), एडवोकेट के.डी. शर्मा (पटना), डॉक्टर वैशाली निगम (देवास), एडवोकेट नवीन शेलर (दिल्ली), श्री दीप सिंह (विदिशा), श्री त्रिभुवन शर्मा (गुमला), एडवोकेट प्रीति प्रसाद (बोकारो), श्री अविनाश आथल्ये (जबलपुर), श्री नवीन कुमार (दिल्ली), श्री मोहन कुमार (श्योहर), ज्योति पांडे (बंगलुरू) तथा मोनिका आर्य (रांची) सम्मिलित हुईं।
इस मौके पर जिन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा हुई, वो इस प्रकार हैं –
1. डॉक्टर वैशाली जो कि NICU की इंचार्ज और pediatrician हैं, उन्होंने ड्राफ्ट तैयार करके दिया कि जब भी शिशु अस्पताल में लाया जाए तो क्या आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि शिशुओं की जानकारी देने के लिए एक सेट फॉर्मेट की आवश्यकता है। यह फॉर्मैट एक या दो पेज का होना चाहिए। वर्तमान में,लगभग अठारह पन्नों का फॉर्मैट है, जिसको भरना डॉक्टरों को भारी पड़ता है।
2. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए ऐड्वकेट केडी मिश्रा ने कहा कि शिशु को सुरक्षित या घायल अवस्था में लाने वाले से अधिक पूछताछ न हो। इसके लिए कॉलम बना दिए जाएं जैसे – अजनबी, सामाजिक कार्यकर्ता, जन प्रतिनिधि, रिश्तेदार इत्यादि।
3. मोनिका आर्या का मत था कि शिशु को लाने वाले का नाम अवश्य पूछा जाए, क्योंकि शिशु को बचाने वाले उसके जीवन रक्षक हैं और यह एक उत्तम कार्य है। अंत में सभी लोग इस बात पर एकमत थे कि शिशु को लाने वाले की जानकारियों को लेना मेंडेटरी न बनाया जाए। क्योंकि पुलिस के डर से बहुत से लोग अपनी जानकारी नहीं देना चाहते हैं।
4. डॉक्टर कृपा शंकर चौबे ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट के सरेन्डर फॉर्म जैसा फॉर्मैट एबेंडन केस में भी रखा जा सकता है।
5. इसके बाद शिशु के ट्रीटमेंट पर चर्चा हुई कि कैसे सरेन्डर किए गए शिशु का इलाज किया जाना चाहिए। इस पर डॉक्टर वैशाली निगम ने डीएनए sampling के विषय में जानकारी दी। डॉक्टर चौबे ने भी अपना मत दिया कि डीएनए संबंधी ऑर्डर करने का अधिकार cwc के पास होना चाहिए, क्योंकि यही बच्चों के संरक्षण से जुड़ी सबसे बड़ी संस्था है।
6. इसके बाद शिशु के डिस्चार्ज को लेकर चर्चा की गई। डॉक्टर वैशाली ने बताया कि डिस्चार्ज के समय शिशु के ट्रीटमेंट, vaccination संबंधी जानकारी शिशु के साथ संलग्न रहती है। यहाँ मोहन कुमार ने सुझाव दिया कि अस्पताल में किसी एक स्टाफ को बच्चे की स्थिति अपडेट व अन्य कार्य हेतु कॉर्डिनेशन के लिए उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए।
7. मोनिका आर्य ने यहाँ यह बात उठाई कि कई बार शिशुओं के विषय मे मीडिया में गलत जानकारी चली जाती है। इससे पॉलिसी बनाने में दिक्कत आती है।
8. एडवोकेट नवीन शेलर ने डेटा और फॉर्मेट के डिजिटलीकरण पर जोर दिया। वहीं त्रिभुवन शर्मा ने सुझाव दिया कि मिशन वात्सल्य में बदलाव करके guidelines बनाई जा सकती हैं, ताकि शिशुओं का डाटा तैयार किया जा सके।


















