मॉनसून की मार: सरायकेला में किसानों की बढ़ी मुश्किलें, रोपनी शुरू पर लागत और परेशानियां भी बढ़ीं

सरायकेला: झारखंड में मॉनसून की दस्तक के साथ ही जहां एक ओर किसानों ने धान की रोपनी का कार्य शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी ओर उन्हें कई प्रकार की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। सरायकेला जिले के ग्रामीण इलाकों में धान की खेती के लिए खेत तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन अत्यधिक बारिश, खेती में बढ़ती लागत, चारा की कमी और सरकारी योजनाओं की अनुपलब्धता ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

‘श्री विधि’ से बढ़ी लागत, पर लाभ सीमित

किसानों का कहना है कि परंपरागत खेती की तुलना में ‘श्री विधि’ से खेती में लागत कई गुना बढ़ गई है। इस पद्धति में बोरो धान के बीज, डीएपी, यूरिया और कीटनाशकों का प्रयोग आवश्यक हो गया है। गांव के किसान गोपाल सिंह बताते हैं, “पहले बैल से हल चलाकर खेती होती थी, गोबर खाद से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी और लागत भी कम आती थी। अब तो बीज और रसायन खरीदना पड़ता है, ऊपर से उत्पादन भी वैसा नहीं है।”

किसानों ने आरोप लगाया कि कृषि विभाग द्वारा न तो समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है और न ही अनुदानित बीज उपलब्ध कराए जाते हैं। इससे किसान निजी स्तर पर महंगे बीज व रसायन खरीदने को मजबूर हैं।

बैल की जगह ट्रैक्टर, जुताई बनी महंगी

खेती में अब पारंपरिक बैल की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है, जिससे खर्च और बढ़ गया है। ट्रैक्टर से सामान्य जुताई के लिए ₹1100 से ₹1300 और रोटरी जुताई के लिए ₹1400 से ₹1600 प्रति घंटा का भुगतान करना पड़ता है। साथ ही, धान की रोपनी के लिए मजदूरी ₹120 से ₹200 प्रतिदिन तक पहुंच गई है। इससे किसानों पर भारी वित्तीय दबाव पड़ रहा है।

असमय बारिश और देरी से रोपनी

बारिश के असमय और अनियमित होने से भी किसान परेशान हैं। कुछ किसानों ने तो रोपनी शुरू कर दी है, लेकिन कई खेतों में अब तक धान का चारा नहीं निकल पाया है। किसान ललाट, सरन, हाइब्रिड और हजार 1 जैसे ब्रांडेड बीज खुद खरीद रहे हैं, जबकि कुछ अब भी पारंपरिक तरीके से बीज अंकुरित कर बुवाई कर रहे हैं।

गांवों में यह आम धारणा बन गई है कि जब बारिश की जरूरत होती है तब पानी नहीं बरसता और जब अधिक बारिश होती है तो खेत में काम करना मुश्किल हो जाता है। किसानों ने इस परिस्थिति को ‘ईश्वर की मार’ कहा है।

टूटे घर, नहीं मिला आवास

मूसलधार बारिश से कई गरीब परिवारों के कच्चे घर ढह गए हैं। लेकिन प्रशासन से उन्हें ‘अबुआ आवास’ या ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत कोई राहत नहीं मिल पाई है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी है और उन्होंने स्थानीय प्रशासन से मांग की है कि उन्हें शीघ्र आवास और राहत सहायता दी जाए।

 

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