जंतर-मंतर जीत गया, रांची अब भी बारिश में बैठा है — झारखंड के छात्रों की वो लड़ाई जो दिल्ली से ज्यादा कठिन है

रांची/नई दिल्ली। 25 जुलाई की शाम दिल्ली के जंतर-मंतर पर पटाखे छूट रहे थे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आ चुका था, कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर दिया था, और आधी रात तक नगर निगम की टीमें दीवारों पर लिखे नारों को पेंट के रोलर से मिटा रही थीं। ठीक उसी शाम, रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में कुछ सौ लड़के-लड़कियां तिरपाल के नीचे बैठकर तय कर रहे थे कि उनका सत्याग्रह कब से शुरू होगा।

दिल्ली की जीत की खबर झारखंड तक पहुंची, तो यहां जश्न नहीं हुआ। हिसाब लगाया गया। अगर दिल्ली में पचास दिन में एक कैबिनेट मंत्री की कुर्सी जा सकती है, तो रांची में एक परीक्षा रद्द क्यों नहीं हो सकती?

दो आंदोलन, दो शहर, एक ही गुस्सा

ऊपर से देखने पर दोनों आंदोलन जुड़वां लगते हैं। दोनों की जड़ में परीक्षा है। दोनों में भूख हड़ताल है। दोनों में बीस-बाईस साल के वे नौजवान हैं जिन्होंने कोचिंग की फीस के लिए घर में खेत गिरवी रखते देखा है। लेकिन जमीन पर उतरिए तो फर्क साफ दिखने लगता है, और यही फर्क झारखंड के आंदोलन को ज्यादा कठिन, ज्यादा जिद्दी और कहीं ज्यादा साफ-सुथरा बनाता है।

जंतर-मंतर: संसद से डेढ़ किलोमीटर दूर का दबाव

दिल्ली का आंदोलन 6 जून को शुरू हुआ था। वजह थी नीट 2026 का कथित पेपर लीक और सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग में गड़बड़ी के आरोप। अगुवाई की कॉकरोच जनता पार्टी ने, जो खुद को व्यंग्य पर टिका एक युवा आंदोलन कहती है। संस्थापक अभिजीत दिपके अमेरिका से लौटे हुए, सोशल मीडिया पर पहले से चर्चित चेहरा। साथ में एआईएसए, एसएफआई और एआईएसएफ जैसे वामपंथी छात्र संगठन जुड़े।

28 जून से सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे और भीड़ कई गुना हो गई। 20 जुलाई को दस हजार से ज्यादा नौजवान संसद की ओर बढ़े। आंसू गैस चली, लाठियां चलीं, करीब 150 लोगों के घायल होने की खबर आई। पांच दिन बाद प्रधान का इस्तीफा आ गया। सरकार ने आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजे और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई न करने की बाकी दोनों मांगें भी मान लीं।

यह जीत असली थी। मगर इसे संभव बनाने वाली एक बात याद रखिए: जंतर-मंतर संसद से डेढ़ किलोमीटर दूर है। वहां बैठा हर आदमी सांसदों की खिड़की के नीचे बैठा होता है। वहां टाइम मैगजीन के फोटोग्राफर पहुंचते हैं, रॉयटर्स की तस्वीरें दुनिया भर में छपती हैं, और मानसून सत्र की कार्यवाही ठप हो जाती है। दबाव अपने आप बन जाता है।

रांची: बिना कैमरे, बिना पार्टी, बिना छत

झारखंड के छात्रों के पास इनमें से कुछ नहीं था।

यहां चिंगारी 19 अप्रैल को हुई 14वीं जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा से भड़की। जुलाई की शुरुआत में रिजल्ट आया और एक ओएमआर शीट सोशल मीडिया पर घूमने लगी। दावा यह था कि सुमन सौरव नाम के एक अभ्यर्थी ने महज 48 सवाल हल करके परीक्षा पास कर ली। छात्रों का आरोप है कि परीक्षा करा रही एजेंसी टीडीपीएल को पहले दूसरी सरकारी संस्थाएं ब्लैकलिस्ट कर चुकी थीं।

5 जुलाई को विरोध की औपचारिक शुरुआत हुई। 7 जुलाई को छात्रों का प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिला। 8 जुलाई को आयोग का पुतला फूंका गया। 20 जुलाई को छात्र मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिले और अपने सबूत सौंपे। यानी हर वह दरवाजा खटखटाया गया जो लोकतंत्र में खटखटाने को कहा जाता है — पहले शिकायत, फिर राजभवन, फिर मुख्यमंत्री आवास। सड़क सबसे आखिरी विकल्प थी, पहला नहीं।

29 जुलाई को बापू वाटिका से अल्बर्ट एक्का चौक तक मार्च निकला। छात्रों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़ी, राष्ट्रगान गाया, और वहीं से अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू हुआ। यह ब्योरा मामूली नहीं है। जिस देश में आंदोलन का मतलब अक्सर पथराव और बसों में आग समझा जाता है, वहां झारखंड के इन नौजवानों ने अपनी लड़ाई की शुरुआत संविधान की प्रस्तावना पढ़कर की।

वह मंच जिस पर किसी पार्टी को चढ़ने नहीं दिया गया

जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम की सबसे बड़ी तस्वीर यही है। धरनास्थल पर दो मंच हैं। एक पर हजारों छात्र, दूसरे पर झंडे-बैनर लिए राजनीतिक कार्यकर्ता। नारे एक, मांगें एक, गुस्सा एक — मगर बैठने की जगह अलग।

यह अलगाव संयोग नहीं, फैसला है। “जेएसएससी-जेपीएससी भ्रष्टाचार मुक्त अभियान” और “जेपीएससी-जेएसएससी कैंडिडेट्स जस्टिस फोरम” जैसे संगठन पहले दिन से कह रहे हैं कि उनका आंदोलन गैर-राजनीतिक है। उनका तर्क सीधा है — अगर इस पर किसी पार्टी का बैनर चढ़ गया, तो कल सरकार पूरी लड़ाई को “विपक्ष की साजिश” कहकर खारिज कर देगी और लाखों अभ्यर्थियों का असली मुद्दा राजनीति के शोर में दब जाएगा।

यही वह जगह है जहां रांची, जंतर-मंतर से आगे निकल जाता है। दिल्ली के आंदोलन की अपनी एक ब्रांडिंग थी, अपना संगठन था, अपना चेहरा था — और अंत में वह चेहरा ही सुर्खी बन गया। रांची में सुर्खी बनने से इनकार किया जा रहा है। जब मीडिया ने भूख हड़ताल पर बैठे देवेंद्रनाथ महतो को “छात्र नेता” लिखा, तो सोशल मीडिया पर छात्रों ने ही सवाल उठाया कि वे झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा से भी जुड़े हैं। अपने ही समर्थक की राजनीतिक पहचान पर इतनी साफगोई से सवाल उठाने वाला आंदोलन इस देश में कम ही देखा गया है।

देवेंद्रनाथ महतो: बुंडू के गांव से भूख हड़ताल तक

महतो रांची जिले के एक छोटे गांव से हैं। शुरुआती पढ़ाई बुंडू में। इसके बाद रांची के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से संस्कृत और कुड़माली में स्नातकोत्तर, फिर हजारीबाग से बीएड। 2015 से वे छात्रवृत्ति, स्थानीय नीति, आरक्षण और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर लगातार सक्रिय हैं। 2024 का विधानसभा चुनाव उन्होंने तमाड़ से निर्दलीय लड़ा था।

2 अगस्त की रात उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। समर्थक उन्हें “झारखंड का सोनम वांगचुक” कह रहे हैं। संयोग देखिए — बुधवार को खुद वांगचुक ने उनसे बात की और आग्रह किया, जिसके बाद महतो ने जल ग्रहण किया। दिल्ली से अभिजीत दिपके ने वीडियो कॉल पर समर्थन जताया और रांची आने की बात कही।

लेकिन महतो अकेले नहीं हैं। मंगलवार को पांच और अभ्यर्थी अनशन पर बैठ गए। बुधवार तक आमरण अनशन करने वालों की संख्या छह तक पहुंच गई। मंगलवार को दिनभर मूसलाधार बारिश हुई और सैकड़ों छात्र वहीं भीगते रहे, वहीं सोए। दिल्ली में भी बारिश हुई थी, पर वहां कैमरे थे। रांची में सिर्फ पानी था।

देश ने खाना भेजा, सरकार ने फाइल भेजी

आंदोलन की सबसे भावुक तस्वीर धरनास्थल पर पहुंचने वाले खाने के पैकेट हैं। पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लोग स्विगी-जोमैटो पर ऑर्डर करके रांची के धरनास्थल का पता डाल रहे हैं। कहीं से लिट्टी पहुंच रही है, कहीं से इडली, कहीं से आलू पराठा। चादरें आ रही हैं, दवाइयां आ रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे जंतर-मंतर पर हुआ था।

धरने पर बैठे ज्यादातर छात्र किसान परिवारों से हैं। उनके लिए सरकारी नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं, पूरे परिवार के लिए एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाली सीढ़ी है। और यही वजह है कि पेपर लीक उनके लिए कोई प्रशासनिक चूक नहीं, सीधी चोरी है।

मांगें, जो सिर्फ किसी का इस्तीफा नहीं हैं

यहां झारखंड के आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी छिपी है। दिल्ली की मुख्य मांग एक व्यक्ति का इस्तीफा थी — प्रतीकात्मक, नापने में आसान, मान लेने पर तुरंत खत्म। रांची की मांगें व्यवस्था की मशीनरी में हाथ डालती हैं:

  • 19 अप्रैल को हुई 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा रद्द की जाए।
  • ओएमआर छेड़छाड़ और पेपर लीक की जांच सीबीआई और ईडी जैसी स्वतंत्र एजेंसियों से हो, क्योंकि राज्य की सीआईडी जांच पर छात्रों को भरोसा नहीं।
  • 2024 के जेएसएससी सीजीएल पेपर लीक की स्वतंत्र जांच हो।
  • ओएमआर शीट में “अनअटेम्प्टेड” यानी पांचवां विकल्प जोड़ा जाए, ताकि बाद में खाली गोले भरने की गुंजाइश ही न बचे।
  • प्रीलिम्स और मेंस अलग-अलग एजेंसियों को दिए जाएं, ताकि किसी एक कंपनी का एकाधिकार न रहे।
  • समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया और परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो।

पांचवां विकल्प जोड़ने की मांग पर एक सेकंड रुकिए। यह किसी नेता के भाषण से नहीं निकली, यह उन बच्चों के दिमाग से निकली है जिन्होंने ओएमआर शीट को इतनी बार भरा है कि उन्हें पता है गड़बड़ी की गुंजाइश ठीक कहां बचती है। यह गुस्सा नहीं, तकनीकी समझ है। और यही इस आंदोलन को नारेबाजी से अलग करता है।

दोनों आंदोलनों का सीधा मुकाबला

बिंदुजंतर-मंतर, दिल्लीजयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम, रांची
अवधि6 जून से 25 जुलाई 20265 जुलाई से जारी, सत्याग्रह 29 जुलाई से
मुद्दानीट पेपर लीक, सीबीएसई ओएसएम14वीं जेपीएससी, जेएसएससी सीजीएल, आबकारी सिपाही भर्ती, मैट्रिक पेपर लीक
नेतृत्वकॉकरोच जनता पार्टी, वामपंथी छात्र संगठनगैर-राजनीतिक छात्र मंच, पार्टी को अलग मंच
मुख्य मांगशिक्षा मंत्री का इस्तीफापरीक्षा रद्द, स्वतंत्र जांच, ओएमआर व एजेंसी सुधार
मीडिया कवरेजटाइम, रॉयटर्स, एएफपी, अल जजीरामुख्यतः क्षेत्रीय मीडिया और सोशल मीडिया
टकराव20 जुलाई को लाठीचार्ज, आंसू गैस, पथरावअब तक पूरी तरह शांतिपूर्ण
नतीजामंत्री का इस्तीफा, तीनों मांगें मंजूरअभी जांच जारी, ठोस फैसला बाकी

सरकार क्या कह रही है

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बुधवार को कहा कि सरकार के दरवाजे खुले हैं और हर सुझाव गंभीरता से सुना जाएगा। उनके मुताबिक जांच जारी है, कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और मांगों से जुड़े फैसले बारीकी से जांच के बाद उपयुक्त समय पर घोषित किए जाएंगे। 31 जुलाई को सीआईडी ने वायरल ओएमआर शीट वाले सुमन सौरव समेत करीब दस लोगों को गिरफ्तार भी किया।

छात्रों का जवाब उतना ही सीधा है — जिस राज्य की एजेंसी पर सवाल हैं, उसी की जांच पर भरोसा कैसे किया जाए? विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक में यह मुद्दा उठा, लेकिन छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से सरकार की औपचारिक बातचीत पर अब तक कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं है।

10 अगस्त: अगला पड़ाव

बुधवार शाम पांच बजे छात्रों ने जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से फिरायालाल चौक तक तिरंगा यात्रा निकालने का ऐलान किया। मंगलवार शाम वे दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर उनकी तस्वीर लेकर अल्बर्ट एक्का चौक तक श्रद्धांजलि मार्च निकाल चुके हैं — यानी जिस सरकार से वे लड़ रहे हैं, उसी के संस्थापक नेता को सम्मान देने से उन्होंने परहेज नहीं किया। यह आंदोलन की परिपक्वता का सबूत है, कमजोरी का नहीं।

चेतावनी साफ है। अगर 10 अगस्त तक कोई ठोस फैसला नहीं आया, तो विधानसभा का घेराव होगा। और अगर तब भी अनदेखी हुई, तो आंदोलन राज्य के चौबीसों जिलों तक फैलाया जाएगा।

असली फर्क

दिल्ली के आंदोलन ने देश को दिखाया कि यह पीढ़ी सड़क पर उतर सकती है। लेकिन दिल्ली के पास वह सब कुछ था जो एक आंदोलन को जिताता है — संसद की नजदीकी, राष्ट्रीय मीडिया, अंतरराष्ट्रीय कैमरे, नामी चेहरे और एक ऐसी मांग जिसे मानकर सरकार मामला एक झटके में खत्म कर सकती थी।

रांची के पास इनमें से कुछ नहीं है। यहां कोई सेलिब्रिटी नहीं आया। यहां किसी विदेशी अखबार का फोटोग्राफर नहीं बैठा। यहां तिरपाल है, कीचड़ है, बारिश है और एक जिद है। और इसके बावजूद ये लड़के-लड़कियां न किसी पार्टी के बैनर तले गए, न एक पत्थर उठाया, न प्रस्तावना पढ़ना भूले।

जंतर-मंतर ने एक मंत्री का इस्तीफा लिया। रांची पूरी परीक्षा व्यवस्था की मरम्मत मांग रहा है। पहला काम मुश्किल था। दूसरा काम कहीं ज्यादा मुश्किल है — और झारखंड के ये नौजवान उसे बिना किसी सहारे के, भीगते हुए, भूखे बैठकर कर रहे हैं।

झारखंड की मिट्टी में संघर्ष कोई नई चीज नहीं है। जो राज्य आंदोलन से बना हो, वहां आंदोलन सिखाना नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लड़ाई जंगल या जमीन की नहीं, एक ओएमआर शीट के गोलों की है — और लड़ने वाले वही हैं जिनके हाथ में सिर्फ पेन था।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

झारखंड में छात्र आंदोलन क्यों हो रहा है?

19 अप्रैल 2026 को हुई 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के नतीजों के बाद एक ओएमआर शीट वायरल हुई, जिसमें कथित छेड़छाड़ का आरोप लगा। इसके साथ जेएसएससी सीजीएल पेपर लीक, आबकारी सिपाही भर्ती विवाद और मैट्रिक पेपर लीक जैसे पुराने मामलों को लेकर अभ्यर्थियों का गुस्सा फूट पड़ा।

छात्रों की मुख्य मांगें क्या हैं?

14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा रद्द करना, सीबीआई और ईडी से स्वतंत्र जांच, ओएमआर शीट में पांचवां “अनअटेम्प्टेड” विकल्प, प्रीलिम्स और मेंस के लिए अलग-अलग एजेंसियां, तथा परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय करना।

देवेंद्रनाथ महतो कौन हैं?

रांची जिले के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने संस्कृत और कुड़माली में स्नातकोत्तर तथा बीएड किया है। 2015 से भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सक्रिय हैं और 2 अगस्त 2026 से रांची में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं।

जंतर-मंतर आंदोलन कब और कैसे खत्म हुआ?

6 जून 2026 को शुरू हुआ यह आंदोलन 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हुआ। सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी की बाकी दोनों मांगें भी स्वीकार कर ली थीं।

आगे क्या होने वाला है?

छात्रों ने चेतावनी दी है कि 10 अगस्त तक ठोस फैसला न आने पर झारखंड विधानसभा का घेराव किया जाएगा और आंदोलन राज्य के सभी 24 जिलों तक फैलाया जाएगा।

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