आरा : नवरात्रि में छठे दिन मां दुर्गा का छठा स्वरुप मां कात्यायनी है। नवरात्रि के छठे दिन इन्हीं की पूजा की जाती है। मां कात्यायनी का जन्म ऋषि कात्यायन के घर हुआ था इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा। मां कात्यायनी की पूजा करने से व्यक्ति को काम, मोक्ष, धर्म और अर्थ इन चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। ऐसे में आज हम बता रहे हैं भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में पूर्वी-उत्तरी छोर पर स्थित मां आरण्य देवी के अति प्राचीन मंदिर के बारे में। इसी मंदिर के नाम पर इस शहर का नाम आरा पड़ा है। मंदिर का इतिहास रामायण काल और पांडव से भी जुड़ा है। इस मंदिर में काले पत्थरों की महा सरस्वती की बड़ी मूर्ति और महालक्ष्मी की छोटी प्रतिमा है। इस मंदिर को किला की देवी के नाम से भी जानते हैं। यहां श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने तक घी के बड़े दीए जलाते हैं।
पुजारी बाबा के अनुसार, मान्यता है कि माता सती का एक अंग यहां भी गिरा था। आरा को शोध संगम क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता था। शोध संगम स्थान का नाम त्रिपुरा रहस्य और मत्स्य पुराण में भी प्राप्त होता है। इसमें शोध संगम स्थान गंगा और सोन के संगम के विषय में वर्णन किया गया है। गंगा और सोन के संगम किनारे आरण्य वन था। आज भी भोजपुर जिला अंतर्गत आरा नगर से 10 KM पूरब क्षेत्र में कोईलवर प्रखंड के बिन्दगांवा ग्राम के पास गंगा का संगम वर्तमान में भी है। साल भर मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ती है।
पुजारी बाबा ने बताया कि इस मंदिर से जुड़ी एक कहानी यह भी है कि ताड़का वध के बाद भगवान राम अपने गुरु विश्वामित्र और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ बक्सर से सीता स्वयंवर के लिए मिथिला जा रहे थे। आरा से गुजरते समय उन्होंने इस मंदिर में पूजा अर्चना की थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान पांडव ने भी यहां देवी की पूजा-अर्चना की। यहीं पर देवी ने प्रकट होकर उन्हें वरदान भी दिया था। इस मंदिर में काले पत्थरों की महा सरस्वती की बड़ी मूर्ति और महालक्ष्मी की छोटी प्रतिमा है। इस मंदिर में काले पत्थरों की महा सरस्वती की बड़ी मूर्ति और महालक्ष्मी की छोटी प्रतिमा है।
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मां आरण्य देवी मंदिर के पुजारी बाबा ने बताया कि पूर्वज कहते रहे हैं कि जब पांडव यहां रात्रि विश्राम कर रहे थे तब धर्मराज युधिष्ठिर को माता ने सपने के माध्यम से बताया कि हमारी एक बहन की यहां पर स्थापना करो। इसके फलस्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा माता आरण्य देवी की प्रतिमा की स्थापना की गई थी। मां की शक्ति चारों तरफ फैली है। मां के दरबार से कभी कोई खाली नहीं जाता है। नवरात्रि के समय देश के कई इलाकों से यहां काफी संख्या में भक्त दर्शन को आते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने पर माता का श्रृंगार भी करवाते हैं।
नवरात्रि में शाम चार बजे से मंदिर परिसर में दीप जलाने के लिए महिला-पुरुष भक्तों की भीड़ उमडी रही। यह सिलसिला संध्या आठ बजे तक चलता रहा। दीप जलाने के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने में मां आरण्य देवी मंदिर विकास ट्रस्ट के पदाधिकारी, सदस्य एवं स्टाफ काफी सक्रिय दिखे। वही दंडाधिकारी की मौजूदगी में महिला-पुरुष पुलिस कर्मी सक्रीय दिखे। मां आरण्य देवी मंदिर विकास ट्रस्ट के मीडिया प्रभारी कृष्ण कुमार ने बताया कि षष्ठी तिथि यानि मंगलवार की रात्रि माता का भव्य श्रृंगार होगा और मंदिर परिसर में सजावट की जाएगी। सजावट के कार्य में कोलकाता के प्रसिद्ध फुल-श्रृंगार कारीगरों की टीम जुट गई है। श्रृंगार में देशी-विदेशी फूलों का उपयोग किया जाएगा। सप्तमी तिथि (बुधवार) की मंगला आरती के बाद माता का भव्य श्रृंगार भक्तों को दीदार करने का मौका मिलेगा। सप्तमी तिथि से दशमी तिथि तक मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु भैरव बाबा के गली के रास्ते मंदिर में प्रवेश करेंगे। वहीं माता के मंदिर का मुख्य द्वार निकास द्वार के रूप में कार्य करेगा।
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नेहा गुप्ता की रिपोर्ट


















