
पटना : बिहार की दलित राजनीति इन दिनों टकराव की पटरी पर दौड़ने लगी है। यह राजनीति राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में कुछ ज्यादा ही दमदार तरीके से प्रारंभ हो चुकी है। अब चुकी गठबंधन की राजनीति में जुबान पर ताला लगा हुआ है। पर अपरोक्ष रूप से दलित नेतृत्व की इस लड़ाई में कोई किसी से कम नहीं। दलित नेतृत्व को लेकर ताजा विवाद का श्रेय हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) को जाता है। एससी/एसटी आरक्षण को लेकर पहली बार जीतन राम मांझी और लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान अलग थलग (Chirag Paswan) दिखे।

दलित नेतृत्व का पक्ष
जीतन राम मांझी न्यायालय के फैसले के साथ खड़े दिखे। साथ ही इस फैसले को दलित के हित में बताते यह भी कह दिया कि ये फैसला 10 साल पहले आना चाहिए था। आज आरक्षण से जुड़े फैसले को चुनौती देने वाले या पक्ष में नहीं रहने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने 76 वर्ष तक इसका लाभ लिया है। उन्होंने कई सवाल चिराग पासवान की सोच के विरुद्ध खड़े किए। पिछले 76 साल से आरक्षण का फायदा चार ही जातियां क्यों उठा रही है? भुइयां, मुसहर, मेहतर जैसी जातियों के कितने आईएएस-आईपीएस हैं? मुसहर, भुइयां, मेहतर जैसी जातियों के कितने कितने चीफ इंजीनियर हैं? मेहतर, भुइयां, नट जैसी जातियों की साक्षरता दर बहुत नीचे है,उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है।
चिराग पासवान आरक्षण की सुविधा में कोई बंटवारा नहीं चाहते
वहीं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान आरक्षण की सुविधा में कोई बंटवारा नहीं चाहते। क्रीमी लेयर को भी नहीं स्वीकार करते। इनका मानना है कि क्रीमी लेयर वालों को आरक्षण से वंचित नहीं किया जाए। वे स्वेच्छा से छोड़े ऐसा वातावरण बने। जैसे स्वेच्छा से गैस सब्सिडी लोग छोड़ते हैं। इसलिए चिराग पासवान ने सर्वोच्च न्यायालय के अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षण में कोटे में कोटा और इसमें क्रीमी लेयर संबंधी निर्णय के समर्थन में नहीं खड़े हुए। दरअसल, चिराग पासवान 19 प्रतिशत राजनीति के साथ दलित के दबंग ग्रुप के साथ खड़े हो कर राजनीति करना चाहते है। अपरोक्ष रूप से इसकी वजह यह है कि चिराग पासवान यह जानते हैं कि वोट के दौरान दलित का मजबूत वर्ग वोट के टर्नआउट में सहायक होते हैं।
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मांझी दलित राजनीति में भी वंचित की लड़ाई लड़ना चाहते हैं
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी दलित राजनीति में भी वंचित की लड़ाई लड़ना चाहते हैं। वे चाहते हैं दलित का क्रीमी लेयर आरक्षण पर अपना दावा नहीं छोड़ता है तो आरक्षण निचले लोगों तक नहीं पहुंच पाएगा। इनका मानना है कि दलित के कुछ मजबूत वर्ग पिछले 76 साल से आरक्षण की सुविधा ले रहे हैं। मुसहर, भुइयां, मेहतर लोग आरक्षण की सुविधा से वंचित हैं। जीतन राम मांझी, दलित में एक बड़ा वर्ग जो सुविधाओं से वंचित है, को साथ ले कर चलना चाहते हैं। अगर दलित नेतृत्व की होड की लड़ाई बिलो द बेल्ट चली गई तो कुछ भी संभव हो सकता है। वर्ष 2020 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में साथी दलों का असहयोग खुल कर सामने आया था।




