खटिया पर विकास, कहानी लूटटी टांड गांव की 

Gaya अति नक्सल प्रभावित, जंगल-पहाड़ों से घिरा इमामगंज के मल्हारी पंचायत के लूटटी टांड गांव के ग्रामीण आज़ादी के कई दशक के बाद भी आज तक एक सड़क की तलाश में हैं. गांव की आबादी करीबन 80 घरों की है. सभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यह गांव आज के दौर में विकास के बीच एक टापू नजर आता है. आज जब विकास की चासनी में सब कुछ लपेट कर बेचा जा रहा है. एक अदद सड़क की मांग कुछ हास्यास्पद नजर आ सकती है, लेकिन यही इस गांव की दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है.

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ग्रामीणों का कहना है कि हमारे लिए पक्की सड़क एक सपना है. हमारी हालत तब और भी गंभीर हो जाती है, जब गांव में कोई बीमार पड़ जाता है, तब हमारे सामने एक ही विकल्प होता है और वह है अपना परम्परागत खटिया. जी हां, वही खटिया जो  बिहार और देश के कई दूसरे राज्यों में सोने का काम आता है. यही खटिया फिर मरीज को लाद कर ढोने का काम आता है. इसी खटिया में मरीज को लाद कर डॉक्टर के पास ले जाया जाता है. इसके कारण कई प्रसूता महिलाओं को अपनी जान गंवानी पड़ती है.

सवाल सिर्फ सड़क की नहीं है. गांव तक एक साईकल भी नहीं जा सकती. सिर्फ और सिर्फ आपका पांव ही आपका सहारा होगा यानी पैदल. दूर दूर तक शिक्षा का कोई साधन नहीं है. लोग लूटटीटांड गांव में ही जन्म लेते है और यहीं उनकी मृत्यु हो जाती है और कुछ मुख्यधारा से भटक कर नक्सली संगठन में शामिल हो जाते हैं. फिर सरकार अचानक निंद से जागती है और करोड़ों रुपये खर्च कर नक्सलियों के विरुद्ध पुलिस बल तैयार करती है. अगर यही रुपया  इनके विकास में लगाया गया होता, उन्हे मुलभूत सुविधाएं प्रदान की जाती. शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा मुहैया करवायी जाती तब देश-प्रदेश के विकास में उनका भी योगदान मिला होता.

ग्रामीणों का कहना है कि यदि  गया ज़िला प्रशासन और बिहार सरकार सड़क निर्माण करा दे जो लूटटी टांड गांव के लोगों का सड़क से जुड़ने का सपना हकीकत में बदल जाय. कहा जा रहा है कि सड़क का टेंडर हो चुका है, लेकिन सड़क निर्माण कहीं दिख नहीं रहा.

रिपोर्ट- राम मूर्ति पाठक 

Saffrn

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